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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

पुलिस, परिवहन और निगम का भ्रष्टाचार बढ़ा रहा है दिल्ली का प्रदूषण

नई दिल्लीः दिल्ली की आबोहवा में सांस लेना मुसीबत को दावत देना बनता जा रहा है। ग्रीन ट्रिब्यूनल से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लगातार प्रदूषण के बढ़ते स्तर का संज्ञान लेकर केन्द्र और राज्य सरकार से जवाब तलब करते रहे हैं। परंतु दोनों सरकारें कोर्ट में शपथ पत्र देकर न्यायपालिका को गुमराह करने के अलावा कुछ भी नही कर रही हैं। इसका जिन्दा सबूत है दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के एक मुख्य कारण भ्रष्टाचार पर दोनों सरकारों का आंखे मूंदे रहना और हालात को बिगड़ते हुए देखकर भी खामोश रहना। यहां तक कि शिकायत किये जाने पर पुलिस और नगर निगम और विभागों को तो छोड़िये केन्द्र सरकार के अनुसार दिल्ली का वास्तविक प्रशासक कहे जाने वाले उप-राज्यपाल महोदय का सचिवालय भी ऐसी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नही करता है और खामोश बना रहता है। 
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण को नियन्त्रित करने के मद्देनजर डीजल बसों पर काफी पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने रोक लगा दी थी। परंतु प्राइवेट बस आपरेटरों का लालच और दिल्ली पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार गठजोड़ ने ग्रीन ट्रिब्यूनल की कोशिशों पर ना केवल पानी फेर दिया है बल्कि दिल्ली को यूपी और हरियाणा नम्बर की डीजल बसों अवैध ठिकाना बनाकर छोड़ दिया है। यह दिल्ली में चलती अवैध बसें बगैर रूट परमिट के दिल्ली यूपी और अन्य पड़ोसी राज्यों के विभिन्न रूटों पर नियमित रूप से चलती हैं, जो ना केवल दिल्ली के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं बल्कि राजस्व की दिन दहाड़े लूट भी है। उत्तर पूर्वी दिल्ली के कुछ लोगों ने इनके खिलाफ शिकायत की तो स्थानीय पुलिस अधिकारी कभी इसे ट्रेफिक पुलिस का मामला बताते रहे और कभी नगर निगम के अधिकार क्षेत्र का मामला। यहां तक कि थाना वेलकम के पूर्व थानाध्यक्ष प्रशांत कुमार ने तो उनके थाना क्षेत्र में इन बसों की अवैध पार्किंग और अवैध संचालन पर सीधे दो टूक जवाब देते हुए कहा कि इसमें हम क्या कर सकते हैं। यह तो नगर निगम का मामला है। इसी प्रकार का रवैया बाकी पुलिस विभाग का भी है। 
- इस प्रकार के अवैध बस संचालन के केवल उत्तर पूर्वी दिल्ली में ही दर्जनों ठिकाने हैं। इनकी सवारियां और सामान उठाने के कई ठिकाने यमुनापार के विभिन्न इलाकों में बने हुए हैं, जिन्हें इनके छोटे अन्तर्राज्यीय बस अड्डे भी कहा जा सकता है। इनके इन ठिकानों में सीलमपुर मेट्रो स्टेशन के पास, शास्त्री पार्क में एचपी गोदाम के पास, यमुना विहार सी-12 के पास, कर्दमपुरी मौजपुर रोड़, मेट्रो स्टेशन जाफराबाद के पास, शाहदरा उत्तरी जोन निगम कार्यालय के पास, रोड़ संख्या 65 मुस्कान के सामने, खजूरी चैक के पास, भजनपुरा के पास, गांवड़ी रोड़ यमुना पुश्ता, श्मामलाल काॅलेज के सामन और बिहारी कालोनी रोड़ कांति नगर के पास इनके यह अवैध बस स्टैंड अथवा बस अड्डे हैं। यहीं से यह निजी बसों का यह माफिया तमाम कानूनों और नियमों को ताक पर रखकर अपना अवैध रूट चलाने का कारोबार करता है। 
-इन बसों की शिकायत बाकायदा नंबर सहित पहले संयुक्त पुलिस आयुक्त ट्रेफिक को उनके फेसबुक पेज पर दी गई और उसके बाद उपरोक्त शिकायत को ऐसी ही 30 से 40 बसें के नंबर और उनके उपरोक्त संचालन के ठिकानों के साथ उप-राज्यपाल कार्यालय को दी गई। परंतु कोई कार्रवाई अभी तक नही हुई। 
-संचालन से जुडे़ कुछ लोगों के अनुसार केवल उत्तर पूर्वी दिल्ली जिले से ही ऐसी अवैध रूट की 200 के लगभग बसों का संचालन होता है। 
-दिल्ली से मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, अमरोहा, गजरौला, संभल, हसनपुर आदि उत्तर पूर्वी दिल्ली से चलने वाली बसों के प्रचलित रूट हैं। यह बसें नियमित रूप से सवारियां और सामान ले जाने का काम करती हैं। 
-नगर निगम की चुंगियों पर भी अक्सर यह बसे बगैर रसीद के पैसा चुकाकर दिल्ली में निगम के कर्मचारियों की मिलीभगत से दाखिल होती हैं।
-दिल्ली के हर चौराहे के ट्रेफिक अधिकारी इन्हे बगैर अवरोधः के जाने देते है! शिकायत  जाने पर औपचारिकता के लिए मामूली चालान काट दिया जाता है बस को जब्त नहीं किया जाता है ! जाहिर है दोनों के बीच कोई समझदारी कोई व्यवस्था कायम है !  
-पुलिस से इनकी मिलीभगत किस स्तर पर है इसका सबसे बड़ा सबूत इनका उत्तर पुर्वी दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त कार्यालय के बाहर से संचालन है। अंधेरा होते ही पुलिस उपायुक्त कार्यालय के बाहर पेट्रोल पंप पर कतार से खड़ी बसें अराजक भ्रष्टाचार की कहानी बयां करती है। 
-यही हाल शाहदरा उत्तरी जोन के नगर निगम कार्यालय का भी है। जिसके सामने से और पीछे से ऐसी दर्जन भर से ज्यादा बसे अलग अलग समय पर संचालित होती हैं। 
-अक्टूबर महीने में एसीपी सीलमपुर से शिकायत करने पर जब एसीपी सीलमपुर की सख्ती के बाद कुछ बसें थाने में कईं दिनों के लिए बंद कर दी गई तो अवैध बस आपरेटर माफिया ने ग्रामीण सेवा और वेन से सवारियों को यूपी बार्डर ले जाने का कारोबार किया था। जिससे यह तथ्य सामने आ गया था कि इन बसों का संचालन अवैध है और इन्होंने दिल्ली में अवैध तरीके से अपने अन्तर्राज्य बस अड्डे बना रखे हैं। जहां से ये लोग रोजाना सवारियां और सामान ले जाते हैं।
-दिल्ली के परिवहन विभाग ने 2016 और 2017 में कईं बार अवैध बसों को जब्त करने का दावा किया है। यहां तक कि जून 2017 में दिल्ली सरकार ने ऐसी 1000 अवैध बसों को जब्त करने का दावा किया था और 24 जून 2017 के अखबारों में यह खबर प्रकाशित हुई थी। परंतु मालूम नही दिल्ली सरकार की अवैध बसों की परिभाषा क्या है। क्योंकि दिल्ली में अभी भी विभिन्न रूटों पर ऐसी अवैध डीजल बसें धुंए के गुब्बार उडाती घूमती हैं।    
-29 सितंबर 2017 को रात 10.30 बजे वेलकम थाना क्षेत्र की जनता कालोनी के एक व्यक्ति की बाईक ऐसी ही बसों के तथाकथित बस स्टैंड की दो यूपी नंबर बसों के बीच से चोरी हो गयी शिकायतकर्ता के लाख गुहार करने पर भी एफआइआर में उपरोक्त अवैध रूट की बसों का जिक्र नही किया गया। शिकायतकर्ता के जोर देने पर शिकायत दर्ज करनेे वाले पुलिसकर्मी ने कहा कि तुम्हें एफआइआर से मतलब है कि इन बसों से हम बसों का हवाला नही देंगे रिपोर्ट में।
-उपरोक्त मामले की शिकायत पुलिस उपायुक्त उत्तर पूर्वी दिल्ली जिले को की गई कोई कार्रवाई नही हुई। अवैध बसे अपनी जगह पर हैं, एफआइआर से बसों का हवाला गायब करने वाला पुलिसकर्मी सुरक्षित है। 
दरअसल, दिल्ली शहर की राज्य सरकार और केन्द्र घोषित असली प्रशासक दोनों ही प्रदूषण को काबू में रखने के प्रयासों के दावें तो करते हैं परंतु वे कागजी और शपथपत्र तक ही सीमित होते हैं और न्यायपालिका और शहर की जनता को गुमराह करने वाले होते है। वास्तव में गैस चैंबर बनती दिल्ली और दिल्लीवासियों की इस क्रूर राजनीतिक खेल को कोई परवाह नही है। यदि परवाह होती तो केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाकर ही प्रदूषण के आधे जहर को कम किया जा सकता था। लेकिन ऐसा हो नही रहा है जो दिल्ली के दोनों प्रशासकों चुने हुए और नियुक्त किये हुए की नेकनीयती और कोशिशों पर सवाल उठाता है। 

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

हो गयी थी ईवीएम मशीने हैक

आइएनएन भारत डेस्क 
गुजरात चुनावों के नतीजों से ठीक पहले पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और कांग्रेस ने ईवीएम मशीनों के हैक हो जाने की आशंका जाहिर कर दी थी। वहीं कामरेज से कांग्रेस उम्मीदवार अशोक जरीवाला ने तो गांधी इंजीनियरिंग कालेज में स्ट्रांग रूम के आपपास वाई-फाई नेटवर्क मिलने की रिपोर्ट भी दर्ज करा दी थी। वैसे जिला प्रशासन द्वारा कहा जा रहा है कि यह नेटवर्क काॅलेज का ही था। 
हार्दिक पटेल ने चुनावों परिणामों के आने से पहले कहा था कि भाजपा 140 साफ्टवेयर इंजीनियरों के माध्यम से पांच हजार हैक करेगी। साथ ही चुनाव परिणामों के आने के साथ ही सोशल मीड़िया पर लोगों ने भी दावा करना शुरू कर दिया कि यह भाजपा की नियन्त्रित जीत है और झूठ को ऐसा गढ़ा गया है कि वह सच लगे। अब सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या सही में इन चुनावों में वाई-फाई हैक हुआ है। चुनाव आयोग और उससे भी ज्यादा भाजपा के नेतागण ईवीएम के बारे में दावा करते रहे हैं कि ईवीएम हैक हो ही नही सकती है। परंतु हाल ही में गुजरात के डिप्टी चुनाव आयुक्त के एल परमार ने अपने एक पत्र में माना है कि ईवीएम हैक हो सकती है। 7 दिसंबर 2017 को चुनाव अधिकारी मामलातदार तहसील को भेजे गए एक आदेश पत्र में उन्होंने माना है कि कुछ जगहों पर वाई-फाई के माध्यम से ईवीएम मशीन में लगी माइक्रो चिप को हैक किया जा सकता है और इसीलिए दूरसंचार कंपनियों से कहें कि वे अपने वाई-फाई कनेक्शन को ईवीएम रखे जाने वाली जगहों पर बंद कर दें। उन्होंने इस पत्र में यह भी आदेश दिया कि यदि कंपनियां कनेक्शन बंद करने से इंकार करती हैं तो जबरदस्ती कनेक्शन बंद करवा दिये जायें।
गुप्त आदेश की तरह से जारी किये जाने वाले इस पत्र में ना केवल ईवीएम के हैक होने को रोकने के लिए वाई-फाई बंद करने के आदेश दिये गये हैं बल्कि राजनेताओं द्वारा लोकतंत्र को खतरा पैदा किये जाने पर भी उन्होंने चिंता जाहिर की है। उन्होंने नेताओं द्वारा इस प्रकार के कृत्य करने पर आगाह करते हुए यह भी लिखा है कि नेताओं द्वारा लोकतंत्र और संविधान से इस प्रकार का फ्लर्टेशन अथवा चोंचलेबाजी देश को जल्दी ही अंधेरे में ले जा सकता है।
अब इस प्रकार की घटनाओं और प्रकरण के सामने आने से जाहिर है कि ईवीएम पर लगातार सवालिया निशान लग रहे और जिस प्रकार चुनाव आयोग और मौजूदा चुनाव आयुक्त ए के ज्योति ईवीएम को लेकर अडियल हैं और उनसे भी ज्यादा वह भाजपा ईवीएम को नही बदलने पर अडियल है जिसके अपने नेता 2009 में ईवीएम पर सवाल उठा चुके हैं। जिसमें लालकृष्ण अडवाणी और सुब्रहाम्णयम स्वामी जैसे बड़े नाम शामिल हैं। ऐसे में ईवीएम और मौजूदा चुनावों में नतीजों पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। वैसे मोदीवादी भाजपा झूठ को जितना और जिस तरह से पेश करके सच बनाती हैं उसे देखते हुए हैकिंग की बात को एकदम से निराधार बताकर खारिज भी नही किया जा सकता है। हार्दिक पटेल का कहना कि केवल पांच हजार मशीनों को हैक किया गया है। यह सलेक्टिव हैकिंग का दावा नई चर्चाओं को जन्म देने वाला है। 

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

एक्जिट पोल की खुल जायेगी पोल

 आइएनएन भारत डेस्क 

नई दिल्लीः गुजरात चुनावों के दूसरे चरण के मतदान के बाद जो एक्जिट पोल के नतीजे मीड़िया में प्रसारित हो रहे हैं वो बेहद चैंकाने हैं। चैंकाने वाले इसलिए है कि  वह जमीन के मतदान रूझानों और पूरे प्रचार के दौरान जनता के रूझानों से एकदम विपरीत हैं। परंतु यदि पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से एक्जिट पोल कराने वाली एजेंसियों की मनोदशा को देखा जाये तो यह उस के अनुरूप ही है। वास्तव में एक्जिट पोल करने वाली अधिकतर एजेंसिया कभी भी भाजपा को हारते देखना ही नही चाहती हैं। या तो यह उनकी राजनीतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता है अथवा उन पर कोई सत्ता का दबाव है कि वह अक्सर जमीनी हकीकत के उल्ट एक्जिट पोल के नतीजे जाहिर करते हैं। 

यदि हम दो तीन उदाहरण लेकर इसे समझे तो एक्जिट पोल एजेंसियों की हकीकत समझी जा सकती है। पहला तमिलनाडु उदाहरण तमिलनाडु को लें जहां पर लगभग सभी एक्जिट पोल के नतीजे डीएमके को जीता हुआ घोषित कर चुके थे परंतु नतीजे जब सामने आये तो जयललिता की स्पष्ट बहुमत से सरकार बनी और एक्जिट पोल धाराशायी हो गये।

दूसरा उदाहरण बिहार को लें जहां पर लगभग सभी एक्जिट पोल के नतीजों ने भाजपा की सरकार ही बनव डाली थी। और बात यहीं तक भी नही ठहरी भाजपा ने तो डाक मतपत्रों के शुरूआत रूझान के अधार पर ही जश्न मनाना शुरू कर दिया था। और कमाल यह था कि एक्जिट पोल के सभी नतीजे तमिलनाडु की तरह सीटों का हिसाब तो छोड़िये मतदान के रूझान से एकदम उल्टी तस्वीर पेश कर रहे थे।  

तीसरा उदाहरण दिल्ली का है जिसमें एक्जिट पोल के नतीजों में आम आदमी पार्टी को बढ़त तो कई ने जरूर दिखाई परंतु टक्कर भाजपा और आप में कांटे की दिखाते रहे। परंतु नतीजा सबके सामने था और भाजपा का पूरी तरह सफाया हो गया था। 

बहरहाल, इन उपरोक्त उदाहरणों से एक बात तो तय है कि कहीं ना कहीं भाजपा को लेकर एक्जिट पोल एजेंसियों का एक पक्षपाती रूझान तो रहता ही है। इसमें यदि हम केरल का उदाहरण लें तो सबसे मजेदार है जहां एक एक्जिट पोल का सर्वे नतीजा तो भाजपा को 8 सीटें देने पर अमादा था। खैर ठीक भी है जब उस एजेंसी की मालिक एक भाजपा के केन्द्रीय मंत्री की बहन हो तो ऐसे नतीजों में कोई आश्चर्य भी नही करना चाहिए। वैसे कई जानकार लोग इन एक्जिट पोल के नतीजों को सट्टाबाजार को उठाने गिराने और कमाई के लिए सटोरियों के किये जाने वाले खेल से जोड़कर देखते हैं।  

अब गुजरात में भी लगभग यही हाल है कि एक्जिट पोल के नतीजे कांग्रेस की बढ़त का रूझान तो दिखा रहे हैं परंतु कांग्रेस को निर्णायक सीट देने के मामले में लगता है कि कुछ घबराहट है। कहीं ऐसा ना हो कि नतीजे दिल्ली की तरह के सामने आयें। क्योंकि गुजरात में 22 साल के विकास, पाटीदार आंदोलन, आदिवासियों की दुर्दशा, व्यापारियों पर नोटबंदी और जीएसटी की मार और दलितों पर बढ़ते हमले ने भाजपा का जनाधार झटक लिया है। ऐसे में एक्जिट पोल के नतीजे देखकर लोग हैरान हैं कि भाजपा को इतने वोट आखिर कहां से मिल गये। बहरहाल 18 दिसंबर को सब पोल खुल जायेगी क्या सच है और क्या झूठ। 

Kerala Election 2016 Exit Poll
Pollsters
UDF+
LDF+
BJP+
Others
Elections.in
45
90
2
3
CVoter
58
78
2
2
India Today-Axis
43
94
3
0
News Nation
70
69
1

Chanakya
57
75
8

NDTV
57
79
3
1

Tamilnadu
Elections.in
95
130
5

4
CVoter
139
78
15

2
India Today-Axis
99
132
0

3
News Nation
97
116
14

7
ABP
95
132

1
6
Chanakya
90
149


4
NDTV
103
120

0
11



Delhi
ABP
43
26
1
Axis
53
17
0
C Voter
39
29
1
Data Mineria
31
35
4
India Today - Cicero
38- 46
19-27
3-5
India TV
31-39
27-35
2-4
News Nation
39-43
25-29
1-3
Today's Chanakya
48
22
0
Zee TV-C voter
31-39
27-35
2-4

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

बदजुबानी और आरोप प्रत्यारोप की नई राजनीति

महेश राठी 
गुजरात चुनावों में जिस तरह की गिरावट और बयानबाजी देश ने देखी है वह तमाम संसदीय गरिमा और संसदीय लोकतंत्र के उच्च पदों की गरिमा को पूरी तरह से तार तार कर देने वाली है। इस राजनीतिक मूल्यों की गिरावट का सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि इस हद दर्जे की गिरावट को और किसी ने नही बल्कि देश प्रधानमंत्री ने सबसे अधिक हवा दी है। यह कोई पहला अवसर नही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस प्रकार की बयानबाजी की हो। इससे पहले अपना ऐसा रंग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार दिखा भी चुके हैं और उसे दोहरा भी चुके हैं।
वास्तव में एक व्यक्ति पर कोई संस्थानिक, सांगठिनक और किसी प्रकार का नैतिक अंकुश नही रहता है तो वह लगातार इस प्रकार के व्यवहार को दोहराए जाने से कोई गुरेज भी नही करता है। ठीक यही हाल देश के प्रधानमंत्री मोदी का है। उनकी बयानबाजी में ना केवल व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप है, बल्कि जातिय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तमाम हथकंड़े हैं। वो उत्तर प्रदेश में जब श्मशान और कब्रिस्तान की बात करते हैं तो जाहिर है कि वह दो संप्रदायों की आस्थाओं और उनके धार्मिक कर्मकाण्ड़ों के आधार पर किसी मनगढ़ंत भेदभाव का इशारा देकर सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। ठीक यही काम वह जातिय सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए भी करते हैं। जिसके लिए वह कभी स्वयं को सार्वजनिक रूप से पिछड़ा घोषित करते हैं तो कभी नीच कहे जाने पर उसे अपनी जातिगत पहचान से जोड़कर बवाल खड़ा करते हैं। ठीक यही बात वह देश के कुछ शीर्ष नेताओं के कुछ पाकिस्तानी राजनयिकों से व्यक्तिगत मुलाकात को पाकिस्तान से सांठगांठ के रूप में पेश करके करते हैं। इसके अलावा मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता की पाकिस्तान यात्रा को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार से उनकी सुपारी देने की यात्रा के रूप में पेश करते हैं, वह भारतीय राजनीति में इस जारी वाद विवाद को एकदम से बाजारू जुमलेबाजी के स्तर पर ले जाते हैं। इस तरह के आरोप किसी सड़कछाप, गली और नुक्कड़ की स्तरहीन बहसबाजी देखे जाने के प्रमाण गली नुक्कड़ की स्तरहीन बहसों के अलावा आपको कहीं मिलेंगे नहीं। कम से कम राष्ट्रीय राजनीति के वाद विवादों में तो नहीं। परंतु यह प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी और उनकी राजनीति के लिए स्वाभाविक हैं और एकदम अनिवार्य भी।
वास्तव में भाजपाई नायक और मौजूदा दौर में देश के प्रधानमंत्री के लिए ही नही दुनिया के किसी भी दक्षिणपंथी नेता की यही भाषा और राजनीतिक विमर्श का तरीका और सलीका हो सकता है। इसमें कुछ भी हैरानी की बात नहीं है। हां, भारतीय संदर्भ में यह भारतीय समाज की विविधताओं के कारण थोड़ा ज्यादा वीभत्स हो जाता है। अभी तक हम भारतीय समाज की विविधताओं पर इतराते हुए इसे विविधता में एकता का अनूठ नमूना बताते हुए अघाते नही थे। परंतु जब यह विविधताएं टूटती हैं और इन विविधताओं को तोड़कर सत्ता शीर्ष पर पहंुचने वाला व्यक्ति हाशिये पर पड़े नफरत वालों और इन विविधता विरोधियों का महानायक बन जता है तो उस समाज के लिए यह विविधताएं एक बड़ा संकट भी बन जाती हैं। विविधता में एकता की खुबसूरती समाज को चुभने लगती है और अभी तक की खुबसूरती समाजिक बदसूरती में बदल जाती है। और यह केवल भारतीय समाज अथवा विकासशील दुनिया के साथ नही हो रहा है बल्कि खुबसूरती के बदसूरती बन जाने की साक्षी आज पूरी दुनिया हो रही है। एकध्रुवीय दुनिया की महाशक्ति अमेरिका से लेकर विकसित दुनिया के पश्चिमी यूरोपीय देश भी इस खतरे को झेल रहे हैं। यदि बात विविधताओं की करें तो संभवतः अमेरिका के न्यूयार्क शहर को दुनिया में विविधताओं की राजधानी माना जाना चाहिए। जहां दुनिया के लगभग 199 देशों के लोग बसते हैं। दुनिया के लगभग सभी देशों में इस उन्मादी दक्षिणपंथ का उभार साफ देखा जा सकता है। सवाल यह है कि यह उभार इतना व्यापक और इतना निर्णायक क्यों हैं और क्यों दुनिया के राजनीतिक विमर्श पर यह दक्षिणपंथी उन्माद पिछले तीन से भी ज्यादा दशकों से अपनी पकड़ बना और बढ़ा रहा है।
दरअसल यह आवारा वित्त पूँजी का तिलिस्म और उसकी मुनाफे की हवश ही है जो आज पूरी दुनिया को उन्माद की भाषा बोलना सीखा रहा है और कहें कि सीखा चुका है। अस्सी के दशक में रोनाल्ड़ रेगन और मार्गरेट थैचर के उदय से शुरू हुआ तथाकथित आर्थिक सुधारों के दौर ने जो विषमताएं दुनिया में पैदा की हैं उसने ना केवल दुनिया की राजनीतिक भाषा को बदलकर रख दिया है बल्कि पूरी दुनिया को एक दक्षिणपंथी भयावह खतरे के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया है। दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री और वित्त विशेषज्ञ बेशक इस दौर के आर्थिक संकटों को पिछली सदी के तीस के दशक से अलग करके देखें और हिटलर के मौजूद संस्करणों को भी अलग तरह से समझने का प्रयास करें परंतु यह तय है कि दुनिया के यह सभी उन्मादी जुमलेबाज आर्थिक विषमताओं और गैर उत्पादक पूँजीवाद की पैदाइश ही हैं। उन्माद की वतर्मान राजनीति का उभरना आवारा वित्त पूँजी के बने रहने की एक आवश्यक शर्त की तरह है। यदि दुनियाभर में उभर रहा यह दक्षिणपंथी उन्माद नही होगा तो ना केवल राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पूँजी का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा बल्कि आवारा वित्त पूँजी और उसके अस्तित्व को बनाये रखने वाले तमाम मौजूदा संस्थानिक उपकरणों और उसकी सभी नीतियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए ही दुनियाभर में यह आवारा वित्त पूँजी दक्षिणपंथी राजनीति को ना केवल हवा देती हैं वरन उसके वित्तीय और वैचारिक पोषण भी करती है। असल में, वित्त पूँजी द्वारा निर्मित विकास की भूमंडलीय अवधारणा ही दुनिया में नये संकट की जड़ है। अपने मुनाफे की भूख के लिए अन्तार्राष्ट्रीय वित्त पूँजी ने जो तथाकथित विकास का विनाशक नव उदारवादी माॅडल तैयार किया है वह अब पूरी दुनिया के प्रगतिशील तबकों और शान्ति पसंद लोगों के लिए ही नही बल्कि सभी के लिए एक चुनौती बन गया है।
विकास की मौजूदा भूमंडलीय अवधारणा के केन्द्र से नागरिक अथवा समाज निकलकर वित्त पूँजी से कमाया जाने वाला मुनाफ काबिज हो चुका है। और अपने मुनाफे के लिए वित्त पूँजी ना केवल सरकारी नीतियों और अर्थप्रणाल के पुराने स्वरूप को बदलती है बल्कि यह अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों को भी पूरी तरह बदल डालती है। अर्थशास्त्र का मांग और पूर्ति का स्थापित नियम समाज की मांग के अनुरूप आपूर्ति के लिए उत्पादन करता है तो वहीं मौजूदा नव उदारवादी आर्थिक नीतियां इसे पूरी तरह से अपने मुनाफे के मुताबिक बदल डालती हैं। इस नये कारपोरेट विकास के दौर में कारपोरेट अपने अधिकतम मुनाफे के अनुसार पहले उत्पाद तैयार करते हैं और उसके बाद उसकी जरूरत के मुताबिक समाज में मांग का निर्माण करते हैं। जाहिर है यह उत्पाद समाज की जरूरतों को पूरा नही करते हैं और इसमें अधिकतर उत्पाद वित्तीय उत्पाद ही होते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय और प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन भी इस उदारवादी विकास एक अनिवार्य जरूरत है। यह आवारा पूँजी के मुनाफे की भूख ही है जो दुनिया के तमाम प्राकृतिक और राष्ट्रीय संसाधनों का दोहन उनकी लूट की तरह करती है और इसके लिए स्वाभाविक तौर उसे सत्ताओं को हड़पने की आवश्यकता रहती है। अपने निर्मित उत्पादों की मांग तैयार करने और संसाधनों के दोहन के लिए सत्ता पर काबिज होने के लिए यह वित्त पूँजी दुनिया के तमाम हिस्सों में ऐसे नायकों को तैयार करती है जो वास्तविक सवालों से इतर भावनात्मक गैर जरूरी सवालों पर राजनीति को केन्द्रित कर सके। कारपोरेट लूट के वाहक बन सकें। मौजूदा नवउदारवादी विकास के इस दौर में पूरी दुनिया में इन उन्मादी खलनायकों की बहार है। अमेरिका के ट्रंप से लेकर भारत में नरेन्द्र मोदी तक यह बदजुबानी उनकी आवारा वित्त की जरूरतों के मुताबिक ही व्यवहार करती है। यह कारपोरेट लूट के नये नायक कभी यह नही बताना चाहते हैं कि उनकी आर्थिक नीतियों के जन्मस्थान क्या है और यह विकास की किस अवधारण पर टिके हैं। वह सड़कछाप जुमलेबाजी कर सकते हैं, विवादास्पद बयान दे सकते हैं और मीड़िया पर कारपोरेट नियंत्रण के द्वारा इन बेतुके सवालों को लगातार हमारे सामाजिक विमर्श के केन्द्र में बनाये रख सकते हैं। इस उन्माद की राजनीति का प्रत्यक्ष लक्ष्य तथाकथित नव उदारवादी विकास का शिकार समाज को बांटना है। हम इसे ट्रंप और मोदी दोनों की भाषा में पढ़ सकते हैं। मौजूदा गुजरात चुनावों में मोदी विकास का अपना तथाकथित एजेंडा भूलकर अपने असली रंग में वापस चले आये। यदि वह विकास के एजेंड़े पर रहते तो उन्हें भाजपा के 22 साल के विकास का हिसाब देना पड़ता जिसमें वह शर्तिया मात खा जाते। इसीलिए मोदी अपने सांप्रदायिक रंग में निकल आये। पाकिस्तान के राजनयिक से पूर्व प्रधानमंत्री और देश के शीर्ष नेताओं के व्यक्तिगत डिनर आयोजन को भी उन्होंने इसीलिए पाकिस्तान से जोड़ा क्योंकि वह जानते थे कि इसके आधार पर वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज कर सकते हैं। अन्यथा पाकिस्तानी पूर्व प्रधानमंत्री से उनकी मोहब्बत और जुगलबंदी पूरे देश ने देखी है। इसके अलावा गुजरात गौरव का उनका गीत भी उनकी इसी रणनीति का ही एक हिस्सा था। वह 2002 के सांप्रदायिक दंगे के एक प्रतीक की तरह हैं जिसे आज इस संकट के समय याद दिलाकर वह भुनाना चाहते हैं। ठीक यही हाल अमेरिका में ट्रंप का भी है जो आज श्वेत नस्लवाद का चेहरा बने हुए हैं और उनके तमाम जुमले उसे नस्लवाद को हवा देने के लिए गढ़े जाते हैं। वास्तव में इस प्रकार के उन्माद की राजनीति करने वाले नायक अपनी जुमलेबाजी से जनता का ध्यान उनके असली मुद्दों और संघर्षो से हटाने का काम करते हैं। और दुनिया भर में मुनाफे की लूट के लिए भटकती आवारा वित्त पूँजी इस वास्तविकता को अच्छी तरह से जानती है और इसीलिए इस उन्मादी राजनीति को बढ़ावा देकर अपना हित साधती है।
परन्तु यह बयानबाजी जिस तरह जनवादी संस्थानों को चुनौती देती है वह लोकतंत्र के लिए एक खतरे ही आहट की तरह है! सत्ता के सर पर सवार इस बयानबाजी को ना बिना दाँतों  का शेर चुनाव आयोग डरा पाता  है, ना इसे न्यायपालिका का खौफ है और ना ही अन्य जनवादी संस्थानों का इस बयानबाजी को भय है! बल्कि जनवादी संस्थानों को चुनौती देने का यह बेख़ौफ़ अंदाज़ ही इन बयानबाजों को नफरत और उकसावे की राजनीति  का महानायक बनाता है! दरअसल, यह नफरत की राजनीति की खास मनोदशा ही है जो अपने लिए बेखौफ सूरमा नायको की मांग करती है जो निरंकुश हों निडर हों और इसी मनोदशा का पोषण करते हुए वित्त पूँजी के स्वामी और प्रबंधक ऐसे अराजक और जुमलेबाज नेता गढ़ते है! इनके समर्थको की यही मांग इन्हे शेर और बब्बर शेर जैसे तमगे  लगाने की प्रेरणा देती है! परन्तु यह जुमलेबाजी लोकतंत्र  के आधार सभी स्तंभों को ध्वस्त करने की शर्त पर ही आगे बढ़ती है! हालाँकि लोकतंत्र को कमजोर करना आवारा वित्त पूँजी की स्वाभाविक जरूरत होती है! लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संस्थान आवारा वित्त पूँजी की आवारगी और मनमानेपन और निरंकुशता को नियंत्रित करते हैं और नागरिको के हितो को केंद्र में रखकर आगे बढ़ते हैं! यही लोकतंत्र और आवारा वित्त पूँजी के बीच टकराव का प्रमुख बिंदु है और टकराव का कारण भी! ऐसा नहीं है कि  केवल घोषित दक्षिणपंथी राजनीति  ही इस टकराव में लोकतंत्र विरोधी होती है बल्कि आवारा वित्त पूँजी की नीतियों को अपनाने वाली तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और जनवादी राजनीति भी अक्सर वित्त पूँजी के हितों  के अनुसार इस प्रकार के दक्षिणपंथी रूझान दिखाती है! भारत में पहली यूपीए सरकार बनने के बाद उस सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 2005 में न्यूयार्क में एक सेमिनार में बोलते हुए कहा था कि बेशक हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है परन्तु यही लोकतंत्र हमारे विकास की रूकावट भी है! वित्त पूँजी के पैरोकारों को तब और लोकतंत्र विरोधी हवा मिल जाती है जब वे विकास का हवाला देते हुए चीन का जिक्र करते है! बहरहाल भारतीय राजनीति जिस नई दिशा में आगे बढ़ रही वह ना तो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक है और ना ही देश के समावेशी विकास के लिए! यदि हम अभी भी समय रहते नहीं चेते तो वित्त पूँजी की मुनाफे की हवश और दक्षिणपंथी राजनीति  का पागलपन देश और दुनिया को उससे भी बड़े खतरे की और ले जायेगा जहां एक समय हिटलर और मुसोलिनी इस दुनिया को लेकर पहुंच गए थे!   

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

राहुल गाँधी ने संभाल ही ली कांग्रेस की कमान

नई दिल्ली। कांग्रेस प्रेसिडेंट पोस्ट के लिए हो रहे चुनाव में राहुल गांधी ने पिछले सोमवार को नॉमिनेशन फाइल किया। कांग्रेस के  सीनियर लीडरों में से कमलनाथ, शीला दीक्षित, मोतीलाल बोरा, तरुण गोगोई जैसे लीडर राहुल के नाम के प्रस्तावक बने थे। इस मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे। नामांकन की आखिरी तारीख होने के बाद भी किसी और ने नामांकन नहीं भरा। ठीक अगले दिन नामांकन की जाँच हुई और उसी दिन साफ हो गया कि राहुल गांधी ही कांग्रेस पार्टी के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेगे। पांच दिसंबर को इनकी स्क्रूटनी हुई। जिसमें राहुल गाँधी का नामांकन सही पाया गया  था। आज 11 दिसंबर 2017 को दोपहर बाद 3 बजे, नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख थी। जो कि सिर्फ एक फॉर्मेलिटी थी। इस फॉर्मेलिटी के पूरा होते ही राहुल गाँधी काँग्रेस पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित घोषित हुए। राहुल इस पद पर पहुंचने वाले नेहरू-गांधी परिवार के छठे शख्स हैं। अब तक कांग्रेस में सिर्फ सोनिया गांधी ही सबसे ज्यादा लगातार 19 साल से अध्यक्ष पद पर बनी रही।

(अध्यक्ष पद पर नेहरू.गांधी परिवार के छठे सदस्य होंगे राहुल)


-7 साल बाद पार्टी में हुए चुनावों में अध्यक्ष बनने वाले राहुल गाँधी नेहरू-गांधी परिवार के छठे शख्स होंगे।
-कांग्रेस के 132 साल के इतिहास में नेहरू.गांधी परिवार का कांग्रेस अध्यक्ष पद पर 44 साल तक कब्जा रहा,  इन 44 साल में से 25 साल मोतीलाल से राजीव गांधी तक कांग्रेस प्रेसिडेंट रहे और बाकि के 19 साल सोनिया गाँधी इस पद पर रही!
-परिवार में पंडित नेहरू सबसे कम 40 साल की उम्र में तो सोनिया सबसे ज्यादा 52 की उम्र में अध्यक्ष बनीं।
-जनवरी,  2013 में राहुल गाँधी कांग्रेस उपाध्यक्ष चुने गए थे, तब से कांग्रेस करीब 27 चुनावों में हारी।

क्या राहुल गाँधी भविष्य के प्रधानमंत्री है


काँग्रेस पार्टी में उपाध्यक्ष की परम्परा नही रही हैं। राहुल से पहले कांग्रेस में दाे और उपाध्यक्ष रहे, पर कभी पीएम नहीं बने!
राहुल गाँधी कांग्रेस में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने वाले तीसरे नेता हैं। उनसे पहले 1986 में अर्जुन सिंह और 1997 में  जितेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर रहे थे। इन दोनों नेताओं का राजनीतिक कैरियर ज्यादा ऊंचाई हासिल नहीं कर पाया।

पार्टी के मुख्य संरक्षक की भूमिका ले सकती हैं सोनिया

सोनिया गाँधी कांग्रेस पार्टी में मुख्य संरक्षक की भूमिका में रह सकती हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने 20 नवंबर को कहा था, सोनिया जी हमारी नेता और मार्गदर्शक हैं। उनका कुशल नेतृत्व और दिशा-निर्देश हमेशा उपलब्ध रहेंगे। तो क्या कांग्रेस पार्टी में भी बीजेपी की तरह  संरक्षक मंडल-मार्गदर्शक मंडल बनेगा,जिसमें कांग्रेस पार्टी के वरिष्ट नेताओं को शामिल कर उन्हें किनारे लगाया जाएगा।

शनिवार, 25 नवंबर 2017

अगले मुकाबले में रॉकी के लिए चुनौती बनेंगे विजेंद्र सिंह

 लंदन। अभी तक लगातार अजेय रहने वाले भारतीय मुक्केबाज विजेंद्र सिंह अपना अगला पेशेवर मुकाबला अगले साल कॉमनवेल्थ सुपर मिडिलवेट चैंपियन रॉकी फील्डिंग से लड़ेंगे। यह ब्रिटिश मुक्केबाज 30 मार्च को विजेंद्र के खिलाफ ब्रिटेन में अपना खिताब बचाने उतरेंगे।
फील्डिंग ने पिछले 30 सितंबर को लीवरपूल में डेविड ब्रॉफी को मात देकर यह बेल्ट जीती थी। दूसरी ओर 31 वर्षीय विजेंद्र पेशेवर मुक्केबाज बनने के बाद से लगातार नौ मुकाबले जीत चुके हैं। दोनों के बीच इस मुकाबले के नियम एवं शर्तों की घोषणा अगले कुछ महीनों में की जाएंगी। फील्डिंग हालांकि डब्ल्यूबीओ एशिया पैसिफिक और ऑरियंटल सुपर मिडलवेट चैंपियन विजेंद्र से कहीं ज्यादा अनुभवी हैं। विजेंद्र ने अगस्त में चीन के जुल्पिकार मैमत अली को दस राउंड के मुकाबले में मात देकर अपना डब्ल्यूबीओ एशिया पैसेफिक सुपर मिडिलवेट खिताब बरकरार रखने के साथ ही जुल्पिकार से उनका  डब्ल्यूबीओ ओरिएंटल सुपर मिडिलवेट खिताब भी छीन लिया था। उसके बाद से वह पहली बार रिंग में उतरेंगे। 

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

एक छोटे शहर की बड़ी कहानी

आईएनएन डेस्क
वह सपनों की उस उड़ान की तरह है जिसे हाल ही में एक बड़े शहर के लोगों में गंवई कहे जाने वाने पहाड़ी अंदाज में बोलते, बेतरतीब से फैशन में लजाते और एक महानगरीय जिंदगी में कुछ सकुचाते और इतराते हुए सफलता की तलाश में भटकते देखा था। आज उसकी चमक चैंधिया देने वाली है, आज उसके फैशन के मुरीद बेशुमार है और वो बोलते हुए अटकती नही मगर कुछ लोगों को खटकती जरूर है। परंतु वास्तव में वह विफलता में सफलता और अपनी आजादी और अपनी जगह पा लेने की एक तिलस्मी कहानी ही है।
यह एक छोटे शहर की लड़की की कामयाबी की जिंदा कहानी है। इस कहानी में रहस्य है, रोमांच है अनगिनत कही अनकही ढ़ोरों कहानियां है। इस कहानी में सफलता के लिए समझौते हैं और सफलता के बाद समझौते के लिए विवश करने वाले दबंगो को चिढ़ाने वाले बयान भी हैं। यह बालीवुड़ में इस दौर की सबसे मंहगी अभिनेत्रियों से एक कंगना रनावत की कामयाबी की तिलस्मी कहानी है। वह एक लड़की जो अपनी किशोर अवस्था में बड़ी कामयाबी की उम्मीद के भारी सपने के साथ अपने परिवार से बगावात करके मुम्बई आ गयी और जिसने ऐसा कामयाब होकर दिखलाया कि मानो घर से चलते हुए वह नाकामयाब ना होने की ठानकर ही चली थी।
कंगना रनावत का जन्म हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से कस्बे भाम्बला में 23 मार्च 1986 को एक राजपूत परिवार में हुआ। कंगना के पिता अमरदीप रनावत एक व्यासायी और मां आशा रनावत स्कूल शिक्षिका थी। यदि पद्मावती फिल्म की रिलीज पर बवाल खड़ा करने वालों के यह सूचना जरूरी है कि कंगना एक परंपरागत राजपूत परिवार की बेटी हैं और उनके पड़दादा सरजू सिंह विधायक थे और उनके दादा दादा भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी थे। डाॅक्टर बनने का सपना लेकर चण्डीगढ़ में दाखिल हुई यह बागी लड़की न जाने कब फैशन उद्योग की तरफ चली गई और दिल्ली में एक फैशन माॅडल के रूप में कुछ समय बिताने के बाद दिल्ली के जाने माने रंगकर्मी अरविन्द गौड़ के थियेटर का हिस्सा बन कंगना ने अभिनय का प्रशिक्षण लिया। वास्तव में यह कंगना के भीतर की वह बगावती लड़की ही थी जो उसे कामयाबी की नई राह की तलाश में बालीवुड़ में ले आयी थी। वह बचपन से इस मायने में बागी थी कि घर में लड़के और लड़की में भेदभाव करने पर लड़ जाने के कंगना के अनेक किस्से हैं। यही बगावत की फितरत कंगना को फिल्म और फैशन उद्योग में खींच ले गयी। वह डाॅक्टर बनना चाहती थी और उसके लिए उनकी तैयारी चल भी रही थी 12वीं कक्षा में केमस्ट्री के यूनिट टेस्ट में यह अभी पढ़ाकू मानी जाने लड़की फेल हो गयी तो उसने डाॅक्टर बनने के सपने को छोड़कर वह अपनी आजादी और अपनी जगह की तलाश में दिल्ली आ गयी और एक फैशन माॅडल एवं एक थियेटर अभिनेत्री के तौर पर नये संघर्ष की राह पर चल पड़ी।
आज के दौर की हसीन ग्लैमर अवतार और फैशन आइकाॅन मानी जाने वाली कंगना को देखकर और उनकी समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखकर कोई कह नही सकता कि कंगना ने दिल्ली में कभी भूखे रहकर अथवा नाममात्र को खाकर भी दिन गुजारे होंगे परंतु जब लड़ाई अपनी आजादी और अपनी जगह को पाने और अपने सपनों के आसमान को छूने की हो तो कुछ भी असंभव नही माना जा सकता है। कामयाबी के सपने कंगना को मुंम्बई खींच लाये और फिर लंबी जद्दोजहद के बाद 2004 में उन्हें पहलाज निहलानी और रमेश शर्मा के साथ पहली फिल्म साइन करने का मौका मिला, परंतु उनकी रिलीज फिल्म अनुराग बसु निर्देशित और महेश भट्ट निर्मित ‘‘गैंगस्टर‘‘ थी। उसके बाद कंगना का संघर्ष कामयाबी का सफर चलता रहा और आज वह देश की सबसे मंहगी अभिनेत्रियों में शुमार एक अभिनेत्री हैं। कामयाबी के बाद भी विवाद उनके साथ बने ही रहते हैं और यह सब उनकी साफगोई और बेबाक बयानबाजी की वजह से ही उनके साथ रहते हैं। वह एक ऐसी निड़र और बेबाक अभिनेत्री हैं जिसने बेहद छोटी उम्र में एक विफलता को जवाब देने के लिए सफलता की नई इबारत लिख डाल, योग्यता और कामयाबी की बुलंदियों के नए आयाम गढ़ दिये।