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सोमवार, 5 नवंबर 2018

मंत्री का गोद लिया गांव लूट से त्रस्त और मंत्री जी मस्त


गौतमबुद्ध नगर से सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा के गोद लिए गांव के लोगों ने मंत्री सहित भाजपा के किसी भी कार्यकर्ता की अपने गांव कचैडा वारसाबाद में घुसने पर रोक लगा दी है। दादरी के गांव कचैड़ा वारसाबाद के लोगों ने गांव के बाहर एक बोर्ड लगा दिया है जिस पर लिखा है कि यहां बीजेपी वालों का आना सख्त मना है। अब यह बोर्ड और इसकी तस्वीर सोषल मीड़िया पर खासी वायरल हो रही है।

दरअसल गांव के किसानों ने ही इस बोर्ड पर यह लिखा है और इसकी वजह उनकी जमीन है। दरअसल किसानों का आरोप है कि भाजपा सरकार ने बिल्डर को उनकी जमीन पर कब्जा दे दिया और जब उन्होंने विरोध किया तो उन पर लाठीचार्ज कराया गया। इसी से नाराज होकर किसानों ने बोर्ड लगाकर लिख दिया- भाजपा वालों का गांव में आना सख्त मना है लिखा है।

दादरी तहसील के गांव कचहैड़ा समेत आसपास के करीब छह गांवों की जमीन को बिल्डर ने सीधा बैनामा कराकर किसानों से लिया था। किसानों को जमीन अधिग्रहण की शर्तो के मुताबिक मुआवजा और सुविधाएं देने का आश्वासन दिया गया था।

आश्वासन के चलते ही किसानों ने अपनी जमीन दी थी। किसान लंबे समय से अतिरिक्त मुआवजा 64.7 फीसदी देने, प्लाट देने समेत मांगों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। आंदोलन के चलते 84 किसान जेल भी चले गए हैं।
मांगों के पूरा नहीं करने के चलते ही जमीन पर कब्जा नहीं दिया गया था। जमीन पर कब्जे को लेकर शुक्रवार को बिल्डर के साथ योगी प्रशासन और पुलिस के अधिकारी पुलिस बल के साथ पहुंचे। जमीन पर पुलिस बल के दम पर कब्जा दिला दिया गया।

विरोध करने पर किसानों पर लाठीचार्ज किया गया। महिलाओं को भी पीटा गया। लाठीचार्ज करने, जेल भेजने से नाराज ग्रामीणों ने रविवार को गांव के बाहर एक बोर्ड लगा दिया है।

ग्रेटर नोएडा के कचैड़ा वारसाबाद गांव में किसानों पर हुए लाठी चार्ज के विरोध में लोगों ने सांसद और विधायक के साथ-साथ बीजेपी पर गुस्सा निकालना शुरू कर दिया है। लोगों ने बोर्ड लगाकर बीजेपी के नेताओं की गांव में एंट्री बैन की बात लिख दी है। इस गांव को सांसद डॉ. महेश शर्मा ने गोद लिया हुआ है। आरोप है कि किसानों पर चार दिनों से अत्याचार हो रहा है, लेकिन सांसद और विधायक ने उनकी सुध नहीं ली है।

2013 में प्रशासन व बिल्डर के बीच हुए समझौते के अनुसार किसानों की मांगें पूरी की जाए। कचैड़ा गांव को क्षेत्रीय सांसद और केन्द्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने गोद लिया, लेकिन आरोप है कि किसानों के हित कोई कदम नहीं उठाया है। इसलिए बीजेपी पार्टी के कार्यकर्ता की गांव एंट्री न होने देने का फैसला लिया गया है। ग्रामीण आकाश नागर ने कहना है कि आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है। बादलपुर कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक विजय कुमार ने बताया कि बिल्डर के काम रोकने व विरोध करने पर पुलिस फोर्स पर पथराव करने के आरोप में किसानों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया है। तीसरे दिन भी बिल्डर का कार्य चालू रहा। विरोध करने पर रिपोर्ट कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। बताया यह भी जा रहा है कि जिस जमीन का अधिग्रहण बिल्डर ने नही किया था उस पर भी बिल्डर ने जेसीबी मशीन घुमवाकर उस पर पुलिस की सहायता से कब्जा ले लिया गया है। 

यूपी की योगी सरकार की सांठगांठ से हो रही बिल्डर की मनमानी के खिलाफ कचैडा और आसपास के गांवों के लोग धरने पर टिक गये हैं और उनका समर्थन करने के लिए सभी दलों के नेता यहां पहुंचना शुरू हो गये हैं। भाकपा के गौतमबुद्ध नगर जिले के पार्टी संयोजक डाॅ. सी सदाशिव भी धरने को संबोधित करने के लिए पहुंचे थे। डाॅ. सदाशिव ने बताया  िकवह भाकपा की तरफ से संघर्षरत किसानों का समर्थन करने दो बार धरना स्थल पर आ चुके हैं। रविवार 4 नवंबर को भी उन्होंने गांव का दौरा किया और किसानों की समस्याओं को जाना। 

रविवार, 4 नवंबर 2018

कौन है झूठ बोलने की असली और सबसे बडी मशीन

महेश राठी

प्रधानमंत्री मोदी ने एकबार फिर से विपक्ष पर निशाना साधा और कहा कि विपक्ष के कुछ नेता झूठ बोलने की मशीन हैं। हालांकि देश में हर कोई जानता है कि झूठ बोलने और गलत आंकडे पेश करने में मोदी का कोई सानी नही है। फिर भी मोदी इस तरह का बयान देने का साहस कर रहे हैं। किसी को यह महज विपक्ष पर एक रूटीन हमला लग सकता है परंतु दरअसल यह भारतीय राजनीति के मूल्यों को अंतिम रूप् से ब्राहमणवादी झूठ की परंपराओं से बदल देने की एक सुनियोजित ब्राहमणवादी साजिश का हिस्सा है। ब्राहमणवाद का पूरा ढ़ांचा झूठ, अफवाहों और गप्पों पर ही टिका हुआ है और यह झूठ और गप और उन पर विश्वास करने और करवाने के सामाजिक ताने बाने पर ही टिका है। 

अब उसी ब्राहमणवादी सामाजिक ताने बाने का सहारा लेकर वह कह रहे हैं कि विपक्ष के कुछ नेता झूठ बोलने की मशीन है। जिससे कि झूठ बोलने को भारतीय राजनीति की नई और स्थापित परंपरा के रूप में पेश किया जा सके। अब संघी गिरोह का अगला तर्क होगा कि केवल मोदी ही झूठ नही बोलते हैं विपक्षी नेता भी झूठ बोलते हैं और झूठ बोलना तो राजनीति का अनिवार्य अंग है। सभी झूठ बोलते हैं। इस प्रकार से झूठ बोलने को राजनीति के लिए अनिवार्य बनाने और पुराने स्थापित मूल्यों को ध्वस्त करने की यह निर्णायक रणनीति है। वैसे देखें तो अभी तक के इतिहास में मोदी से बडा कोई झूठ बोलने और गलत आांकडे पेश करने वाला प्रधानमंत्री ना पैदा हुआ है और शायद होगा भी नही। अब देखते हैं मोदी के बडे और भारी झूठः

-3 मई को एक सभा में बोेलते हुए मोदी ने कहा कि सिद्दरमैया के शासन में बैंगलुरू एक कूडे के ढेर में बदल चुका है। 
यह सही है कि शहर में पर्यावरण पिछले सालों में बिगडा है परंतु यदि दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित षहरों की सूची देखें तो उसमें बैंगलुरू शामिल नही है बल्कि दक्षिण को कोई शहर इसमें नही है तो वहीं मोदी का अपना निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी इसमें शामिल है। बल्कि उत्तर भारत के भाजपा शासित राज्यों के कई शहर इसमें शामिल हैं। अब इतनी ढिठाई के साथ केवल मोदी ही झूठे आंकडें दे सकते हैं। 

-मोदी यहीं नही रूके अपनी अगली 6 मई की रैली में मोदी ने फिर झूठ बोला। उन्होंने कहा कि सोनिया और राहुल गांधी ने प्रेसीडेंट रामनाथ कोविंद को उनके निर्वाचन पर बधाई नही दी थी। यह कांग्रेस का घमण्ड है। 
जबकि वास्तविकता यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने प्रेसिडेंट कोविन्द को उनके चुने जाने पर 20 जुलाई 2017 को ही बधाई दी थी। 
https://twitter.com/BJP4India/status/993110170510049280 

https://twitter.com/INCIndia/status/888053870064279561

-इसी प्रकार मोदी ने 2014 में भाजपा की जीत पर भी बधाई नही देने का झूठ बोला था। उन्होंने कहा कि सोनिया और राहुल ने 2014 में चुनाव जीतने पर भाजपा को बधाई नही दी थी। 
हालांकि यह भी हमेशा की तरह मोदी का एक और झूठ था जबकि राहुल और सोनिया गांधी ने भाजपा को 2014 में चुनाव जीतने पर बधाई दी थी। 

-मोदी ने ऐसा ही झूठ भगत सिंह से कांग्रेस के नेताओं के नही मिलने पर भी बोला था। बीदर की एक रैली में मोदी ने कहा कि कांग्रेस के नेताओं को भ्रष्ट नेताओं से मिलने का समय है तो परंतु क्या वे कभी जेल में जाकर भगत सिंह से भी मिले थे। क्या उनके पास इतना समय नही था। 
वास्तविकता यह है कि उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू ने जेल में शहीद भगत सिंह और उनके साथियों से मुलाकात की थी। ना केवल उन्होंने उनसे मुलाकात की थी बल्कि उनके बारे में बाद में लिखा भी था। यहां तक कि उन्होंने जेल में बंद इन क्रान्तिकारियों की खराब हालत पर बेहद दुख जताया था। मोदी के इस बयान पर टिप्पणी करते हुए इतिहासकार इरफान हबीब ने लिखा कि पहले इतिहास को पढो फिर बोलो और इतिहास का अपनी राजनीति के लिए दुरूपयोग मत करो।  


-नवंबर 2003 में एक रैली में महात्मा गांधी के बारे में चर्चा करते हुए उन्हें मोहनलाल करमचंद गांधी कह दिया।
महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। मोदी की इस गलती पर उनकी काफी किरकिरी हुई थी।

-वर्ष 2013 में पटना की बहुचर्चित रैली में नरेंद्र मोदी ने बिहार की शक्ति का जिक्र करते हुए सम्राट अशोक का जिक्र किया, पाटलिपुत्र का जिक्र किया और फिर नालंदा और तक्षशिला का।
तथ्य ये है कि तक्षशिला पाकिस्तान में है.

-जुलाई 2003 में नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में कहा था कि आजादी के समय एक डॉलर की कीमत एक रुपए के बराबर थी।
यूपीए सरकार की नाकामी गिनाते-गिनाते नरेंद्र मोदी ये भूल गए कि उस समय एक रूपए की कीमत 30 सेंट के बराबर थी और उस समय एक रुपया एक पाउंड के बराबर था।

-अहमदाबाद में अक्तूबर 2003 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अहमदाबाद नगरपालिका में महिलाओं के आरक्षण का प्रस्ताव सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1919 में रखा था।
लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ये भूल गए थे कि वल्लभ भाई पटेल ने ये प्रस्ताव 1926 में दिया था।

-फरवरी 2014 में नरेंद्र मोदी ने मेरठ में कहा था कि कांग्रेस ने आजादी की पहली लड़ाई को कम कर के आँका था।
तथ्य ये है कि मेरठ में 1857 की क्रांति शुरू हुई थी। लेकिन मोदी ये भूल गए कि कांग्रेस की स्थापन 1885 में हुई थी। 1857 में कांग्रेस का कोई अता-पता नहीं था।

-नवंबर 2003 में बंगलौर में नरेंद्र मोदी ने कहा था- 15 अगस्त का प्रधानमंत्री का भाषण लाल दरवाजे से होता है।
अब ये कोई बताने वाला तथ्य नहीं है कि पीएम लाल किले से भाषण देते हैं।

-2003 में मुंबई में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वर्ष 1960 से महाराष्ट्र में 26 मुख्यमंत्री हुए हैं।

तथ्य ये है कि 2003 तक सिर्फ 17 नेताओं ने 26 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है।

-नरेंद्र मोदी ने एक बार कहा था कि जब हम गुप्त साम्राज्य की बात करते हैं कि हमें चंद्रगुप्त की राजनीति की याद आती है।
दरअसल मोदी जिस चंद्रगुप्त का और उनकी राजनीति का जिक्र कर रहे थे, वो मौर्य वंश के थे। गुप्त साम्राज्य में चंद्रगुप्त द्वितीय हुए थे। लेकिन मोदी उनका जिक्र नहीं कर रहे थे।

-दिसंबर 2013 में नरेंद्र मोदी ने जम्मू में एक रैली के दौरान कहा था कि मेजर सोमनाथ शर्मा को महावीर चक्र और ब्रिगेडियर रजिंदर सिंह को परमवीर चक्र मिला था।
तथ्य ये है कि मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र और रजिंदर सिंह को महावीर चक्र मिला था।

-नवंबर 2013 में खेड़ा में नरेंद्र मोदी श्यामजी कृष्ण वर्मा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी में अंतर नहीं कर पाए।

-मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गुजरात का बेटा कह दिया और ये भी कह दिया कि उन्होंने लंदन में इंडिया हाउस का गठन किया था। और उनकी मौत 1930 में हो गई थी। दरअसल श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म कोलकाता में हुआ था। उनकी मौत 1953 में हुई थी। 
मोदी श्याम कृष्ण वर्मा की जगह श्यामा प्रसाद मुखर्जी बोल गए। अब जो इंसान अपने आदर्श नेता के बारे में भी गलत सूचनाएं प्रसारित, प्रचारित करता हो भला उसका किसके मुकाबला किया जा सकता है। 

-पटना में रैली के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सिकंदर की सेना ने पूरी दुनिया जीत ली थी। लेकिन जब उन्होंने बिहारियों से पंगा लिया था, उसका क्या हश्र हुआ। यहाँ आकर वो हार गए।
सिकंदर की सेना ने कभी गंगा पार ही नहीं की। सिकंदर 326 ई.पू. तक्षशिला से होते हुए से पुरु के राज्य की तरफ बढ़ा जो झेलम और चेनाब नदी के बीच बसा हुआ था। राजा पुरु से हुए घोर युद्ध के बाद वह व्यास नदी तक पहुंचा, परन्तु वहां से उसे वापस लौटना पड़ा। इस तरह से सिकंदर पंजाब से ही वापस लौट गया था।

-लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा कि चीन अपनी जीडीपी का 20 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है, लेकिन भारत नहीं।
हकीकत ये है कि चीन अपनी जीडीपी का सिर्फ 3.93 प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च करता है। जबकि वहीं भारत में अटल सरकार में शिक्षा पर जीडीपी का 1.6 प्रतिशत खर्च हुआ और यूपीए सरकार में 4.04 प्रतिशत।  

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

राफेल डील सीधे दलाली का मामला, नही बचेंगे मोदी

महेश राठी 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर फिर से निशाना साधा है। अबकी बार राहुल गांधी ने पीएम मोदी को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि राफेल का मामला सीधे सीधे दलाली का है और यदि इस मामले की जांच होती है तो मोदी को कोई नही बचा सकता है। 

राहुल गांधी ने राफेल में अनिल अंबानी को फ्रांसिसी कंपनी दासाॅ द्वारा 285 करोड दिये जाने और उसके बाद अंबानी द्वारा डिफेंस कंपनी बनाये जाने पर भी सवाल खडे किये हैं। उन्होंने सीधे तौर अंबानी को घेरते हुए कहा कि लगातार घाटा झेल रहे अंबानी को फायदा देने के लिए ही सरकारी कंपनी एचएएल को सौदे से बाहर किया था। ध्यान रहे कि एचएएल पिछले 70 सालों से रक्षा क्षेत्र की देश की सबसे प्रतिष्ठित और गौरवशाली इतिहास बनाने वाली कंपनी है। एचएएल ने मिग 27, मिग 21, जगुआर, सुखोई जैसे विमान और सेना के लिए असंख्य हैलीकाप्टरों से लेकर विभिन्न प्रकार के रक्षा उपकरण तैयार किये हैं। जबकि दूसरी तरफ अनिल अंबानी को रक्षा क्षेत्र का कोई अनुभव नही है और राफेल डील होने से महज 12 दिन पहले ही उनकी डिफेंस कंपनी वजूद में आयी थी। 

इसके अलावा राफेल डील को लेकर सरकार के विभिन्न मंत्रियों और नौकरशाहों के बयान भी इस पर सवाल खडे करते रहे हैं। मोदी के राफेल डील करने के लिए फ्रांस जाने के दो दिन पहले ही भारत के विदेश सचिव ने बयान दिया था कि राफेल सौदा पुरानी शर्तों और एचएएल के साथ ही होगा। इसके अलावा एक सवाल के जवाब में उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने भी साफ शब्दों में कहा था कि राफेल डील मि. मोदी ने ही की है। इसके अलावा एक आश्चर्यजनक बयान पिछले दिनों कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व रक्षा मंत्री और भाजपा नेता जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह ने भी दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि राफेल डील के बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि इसमें और मनोहर पार्रिकर की गंभीर बीमारी में कोई संबंध जरूर है। 

अब जबकि राहुल गांधी ने मोदी और अनिल अंबानी के संबंधों और राफेल डील पर सवाल उठाये हैं और कहा है कि यदि जांच होगी तो मोदी बच नही सकते हैं तो इससे अनिल अंबानी के कारोबार से लेकर अब रक्षा सौदे में डील और मोदी की भूमिका फिर से संदेह के घेरे में आ चुकी है। 

अनिल अंबानी का डूबता कारोबार


अनिल अंबानी पिछले कुछ सालों से अपने अधिकतर कारोबार में घाटे का सामना कर रहे हैं। एक जमाने में वह देश के शीर्ष अमीरों में शुमार होते थे। यहां तक कि वह अपने भाई के साथ देश के सबसे अमीरों में दूसरे पायदान पर भी रहे हैं। परंतु पिछले कुछ दिनों की फोब्र्स द्वारा जारी की गई देश के शीर्ष अमीरों की सूची पर निगाह डालें तो अनिल अंबानी की बदतर होती हालत को समझा जा सकता है। साल 2014 में अनिल अंबानी देश के सबसे अमीर लोगों की सूची में 13वें पायदान पर खडे थे तो वहीं 2015 में वह इसमें नीचे गिरकर 29वें स्थान पर चले गये थे। उनके नीचे जाने का यह क्रम यहीं रूका नही बल्कि लगातार चलता ही रहा है। 2016 में अनिल अंबानी फोब्र्स की सूची में 32वें स्थान पर चले गये तो वहीं 2017 में वह खिसककर 45वें स्थान पर जा चुके थे। और 2018 में वह इस सूची में राफेल के बावजूद 68वें स्थान पर हैं। देश के शीर्ष अमीरों में से एक का यह हाल स्वयं ही उनके कारोबारी हालात और डूबते कैरियर का गवाह है। इस डूब से निकलने के लिए अनिल अंबानी ने मोदी के साथ गठजोड करके संभवत इस डूबते कैरियर को संभालने की कोशिश में यह राफेल डील कर डाली होगी जो आज उनके लिए जीवन का सबस बड़ा सरदर्द बनी हुई है। 

हालांकि अंबानी ने यह डील बेवजह नही की है। मोदी की संगत और कृपा से अमीर होने का एक उदाहरण होने जरूर देखा होगा जिससे उन्हें मोदी की शरण में जाने की प्रेरणा मिली होगी। यह उदाहरण है बाबा रामदेव के सखा आचार्य बालकृष्ण का। यदि आप 2014 के देश के सौ सबसे अमीरों की सूची देखें तो आप पायेंगे की उसमें आचार्य बालकृष्ण जैसे किसी शख्स का जिक्र तक नही है। बल्कि उस समय तक उन पर कर चोरी से लेकर विभिन्न प्रकार की आर्थिक अनियमिततओं एवं दो पासपोर्ट रखने आदि के 80 से अधिक मामले विचाराधीन थे। परंतु 2014 में मोदी के सता में आने के बाद उन पर चल रहे लगभग सभी मामले खत्म हो गये और आचार्य बालकृष्ण नामक यह सज्जन देश के सौ अमीरों की सूची में 48वें पायदान पर खडे नजर आने लगे और उनके अमीर होने का यह सिलसिला यहीं नही रूका बल्कि 2017 में वह 19वें देश के सबसे अमीर आदमी बन गये थे। कल तक विभिन्न अपराधिक और गैर अपराधिक मामलों में फंसे हुए और सन्यास ले चुके हरिद्वार के दो लोगों की कामयाबी के सफर और उसमें मोदी एंगल ने जरूर ही अंबानी को प्रभावित किया होगा और वह घाटे से उबरने के लिए राफेल डील के मुकाम तक पहुंच गये। 

आज जब राहुल गांधी राफेल को लेकर सीधे मोदी और अंबानी पर निशाना साध रहे हैं और चुनौती दे रहे हैं कि उन्हें कोई नही बचा सकता है तो जाहिर है कि देश की जनता अंबानी के कारोबारी संकट और उससे निकलने के मोदी एंगल और रामदेव और बालकृष्ण की कामयाबी और उसमें मोदी एंगल पर अवश्य ही विचार करना चाहेगी। 

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

मंत्री जी, आप दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए कितने गंभीर हैं?

माननीय श्री हर्षवर्धन जी, 
मैं यह पत्र आपको अपने प्रिय शहर दिल्ली की चिंता करने वाला एक दिल्लीवासी समझकर कर रहा हूं। इसके अलावा आपको को पत्र लिखने का एक कारण हाल ही में दिल्ली के पर्यावरण को लेकर आपकी अचानक हुई सक्रियता भी है। आपने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए 70 टीमें बनाने की घोषणा की है। यह 70 टीमें विभिन्न क्षेत्रों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय करेंगी। मैं आपकी मंशा पर कोई सवाल नही उठाना चाहता हूं पंरतु दिल्ली में बढ़ते हुए प्रदूषण को देखता हूं और आपके द्वारा किये जा रहे उपायों पर निगाह डालता हूं तो आपके मंत्रालय द्वारा किये जा रहे उपायों को सतही और न्यायपालिका को संतुष्ट करने की कोशिश के लिए किये जा रहे प्रयासों से अधिक कुछ नही पाता हूं। 

दिल्ली में प्रदूषण को सबसे अधिक बढ़ावा देने वाले दो प्रमुख कारण हैं, एक निर्बाध ढ़ंग से जारी अवैध निर्माण और दूसरा वाहनों से होने वाला प्रदूषण। पहले को रोकने के लिए डीडीए के वाइस चैयरमेन की अध्यक्षता में एक एसटीएफ का गठन किया गया है। परंतु आप यदि अपनी 70 टीमों को दिल्ली के तीनों निगमों में अवैध निर्माण पर की गयी कार्रवाई की जांच करने के लिए कहें और निगम के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करें तो शर्तिया आपको आधे से अधिक निगमकर्मियों को घर भेजना पड़ जायेगा। दिल्ली में जितनी भी संपतियों को सील किया गया है अथवा ध्वस्त किया गया है, आप पायेंगे की सारी कार्रवाई केवल कागजों पर ही है। जमीन पर सील की गई और ध्वस्त की गयी सभी संपतिया सुरक्षित और शान से खडी हैं। इस अव्वल दर्जे के भ्रष्टाचार के कारण ही दिल्ली का 60 प्रतिशत प्रदूषण है। मैं दावे से कहता हूं कि आप यदि दिल्ली पुलिस और नगर निगम के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की कोई योजना बनायें तो दिल्ली को इस जानलेवा प्रदूषण के 60 प्रतिशत हिस्से से निजात मिल सकती है। 

नगर निगम के अलावा दूसरा प्रदूषण बढ़ने का कारण वाहनों का प्रदूषण है। इसे नियंत्रित करने के लिए अब निजी वाहनों पर बंदिश लगाने की बाते होने लगी हैं। यदि प्रदूषण को रोकने के लिए यह जरूरी है तो अवश्य किया जाना चाहिए परंतु उस डीजल बस माफिया का क्या जो दिल्ली पुलिस और परिवहन विभाग की मिलीभगत से प्रदूषण फैलाने का एक बड़ा कारण बना हुआ है। इस बस माफिया की दो ऐसे करतूतों पर मैं यहां रोशनी डालना चाहूंगा जो माननीय न्यायपालिका नेशनल हरित न्यायाधिकरण की आंखों में दिल्ली पुलिस और परिवहन विभाग की साठगांठ से धूल झौंक रहा है। 

पहला एनजीटी और उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में प्रदूषण को थामने की नीयत से डीजल बसों के पंजीकरण पर रोक लगा दी और यह कदम दिल्ली में सीएनजी बसों को संचालित करने और प्रदूषण को नियंत्रित करने की नीयत से किया था। परंतु दिल्ली में प्राइवेट बस मालिकों ने क्या कमाल का रास्ता डीजल बसों को चलाये रखने का निकाला। उन्होंने अपनी डीजल बसों को दिल्ली में पंजीकृत करने की अपेक्षा उन्हें पडोसी राज्यों में पंजीकृत करा लिया। आप दिल्ली के पुराने रहने वाले हैं। आपके स्थायी निवास कृष्णानगर में अनेकों टूर आपरेटर्स के कार्यालय हैं। जाहिर है उनसे से कईं आपके परिचित भी होंगे। इसके अलावा आपके कईं निजी स्कूलों के मालिक भी होंगे आप उनके स्कूलों में झांककर इस सच्चाई को देख सकते हैं कि वहां छात्रों को लाने ले जाने के मकसद से यूपी नंबर की बसे क्यों हैं। या आपके घर के करीब के टूर आपरेटर के पास इतनी यूपी नंबर की बसें पिछले सालों में अचानक क्यों बढ़ गयी हैं। इसी प्रकार हरियाणा के साथ सटे इलाकों में आपको हरियाणा और राजस्थान नंबर की बसें मिल जायेंगी। अब यही इस बस माफिया का कमाल है कि उन्हें न्यायपालिका ने डीजल बसें बदलने के लिए कहा और उन्होंने केवल अपनी नंबर प्लेटे ही बदली बाकि सब यथावत बना रहा। आपके स्थायी निवास कृष्णानगर के बेहद करीब कडकडडूमा सीबीडी मैदान में आप इन्हें अवैध तरीके से रोजाना पार्क किये देख सकते हैं और इसके अलावा दिल्ली पुलिस मुख्यालय के एकदम करीब शहीद भगत सिंह पार्क के पास भी आप इनके जमावडे का रोजाना आनन्द ले सकते हैं। ऐसे बसों की दिल्ली में संख्या कईं हजारों में जाहिर है कि इनसे प्रदूषण ही बढ़ता होगा। 

इसके अलावा इस बस माफिया का दूसरा कमाल दिल्ली के विभिन्न इलाकों से चलने वाली पडोसी राज्यों की खटारा बसें हैं। वह रोजना दिल्ली में आती हैं और विभिन्न इंटरस्टेट रूटों पर बगैर परमिट और बगैर किसी अन्य प्रकार की इजाजत के चलती हैं। आप इन्हें यमुनापार के विभिन्न इलाकों से रोजाना चलते देख सकते हैं। यह इसे दिल्ली से रोजाना मुरादाबाद, हरदोई, बिजनौर, बरेली, शहाजहांपुर, आजमगढ़ जैसे यूपी के विभिन्न इलाकों में जाती हैं। एक बस में यात्रियो को जानवरों की तरह भरा जाता है। आपको हैरानी हो सकती है कि एक बस में एक बार में 100 से लेकर 120 तक यात्रियों को ठूसा जाता है। हाल ही में मैनपुरी के करीब इसी प्रकार की एक बस के पलट जाने के कारण 20 यात्रियों की मौत हो गयी थी। और यह भी आश्चर्यजनक परंतु सत्य है कि इस बस के आपरेटर का कार्यालय आपके स्थायी निवास के बेहद करीब कांति नगर में ही है। दिल्ली के विभिन्न इलाकों में इस समानान्तर परिवहन प्रणाली के बस स्टैंड हैं। जिसमें सबसे प्रमुख इलाके विजय घाट, खजूरी, सीलमपुर, वेलकम, सीमापुरी, कांतिनगर, ओखला, जामियानगर, धोलाकुंआ आदि हैं। सरकार के राजस्व को हडपने वाली और हमारी सांसों में जहरीला धुंआ भरने वाली इस समानान्तर परिवहन प्रणाली की बसों की संख्या 1000 से 1500 के आसपास है। 

आप की 70 टीमें संभवत उस प्रदूषण को रोक नी सकती हैं जिससे दिल्ली गैस का चैंबर बन रही है परंतु यदि आप 5 से 10 टीमें इस बस माफिया पर काबू करने में लगा दें और यह सुनिश्चित कर दें कि भविष्य में भी यह बस माफिया सक्रिय ना हो सके तो शर्तिया आप दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के बडे हिस्से को नियंत्रित करने का स्थायी हल कर सकेंगे। मैं यह पत्र आपको एक मंत्री से पहले एक दिल्लीवासी समझकर लिख रहा हूं और आशा करता हूं कि आपको दिल्ली से उतना ही प्यार होगा जितना मुझे अथवा किसी अन्य दिल्लीवासी को है और आप बस माफिया के इस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर हमें थोडी राहत देने का काम करेंगे और आपका प्रदूषण नियंत्रण अभियान वास्तविक होगा अदालत को संतुष्ट करने वाली कोई रस्म अदायगी नही।  

शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

मोदी सरकार को मिला पुलिसिया चाणक्य


सीबीआई के महाभारत के बीच में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल एकबार फिर से चर्चाओं में है। डोभाल इस पूरे मामले में सरकार को फजीहत से बचाने और सीबीआई चीफ वर्मा और मोदी के लाडले अस्थाना के बीच सुलह सफाई के लिए फिर से मैदान में उतरे हैं। इससे पहले डोभाल मीटू मामले में फंसे एम जे अकबर के खिलाफ बने माहौल के बीच सरकार को फजीहत से बचाने के लिए मैदान में उतरे थे। अब डोभाल की भूमिका को देखकर लगता है कि वह देश की सुरक्षा नही बल्कि मोदी सरकार की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय सलाहकार बने हैं। जिस प्रकार विदेश नीति से लेकर राजनीतिक मामलों में अजीत दाभोल का दखल बढ़ा है उससे हमेशा विवादों में रहने वाले दाभोल को मोदी सरकार के नये चाणक्य के रूप में पेश किया जा रहा है। 

दरअसल, दाभोल की काम करने की शैली और नरेन्द्र मोदी को ठीक उसी प्रकार के व्यक्ति की आवश्यकता दाभोल को मोदी का विश्वसनीय बनाती है। दाभोल एक पुराने मंझे हुए आईबी अधिकारी रहे हैं और इंटेलिजेंस एजेंसिया दुनिया के किसी भी देश की हों उनका काम और काम करने का ढ़ंग कानून के दायरे से अक्सर बाहर होता है। या कहें किसी हद तक उनका तरीका गैर कानूनी भी रहता है। अमेरिकी एजेंसी सीआईए इसका जहां बड़ा उदाहरण है तो वहीं मोसाद, आईएसआई के कारनामें भी दुनिया के विभिन्न देशों की इंटेलिजेंस एजेंसियों के असली कारनामों और उनके असली काम की गवाही देती हैं। असल में इन इंटेलिजेंस एजेंसियों को कभी भी अपने अथवा कथित तौर पर दुश्मन देश के कानून की परवाह रहती ही नही है। उन्हें अपने देश की सत्ता में बैठे अपने मालिकों के वर्गीय हितों को पूरा करना होता है। और इसमें भी यदि आईबी अधिकारी अजीत दोभाल जैसा अतिसक्रिय व्यक्ति हो तो वह अपने कारनामों से अपने मालिकों का चहेता बन जाता है और वह केवल उस समय राजनीतिक भूमिका में आता है जब उसके मास्टर के पास विश्वसनीय राजनेताओं का सरासर अभाव रहता है और उसके मास्टर को अपने राजनीतिक सहयोगियों पर हमेशा शंका बनी रहती है। 
इसी अवसर का लाभ आज अजीत दोभाल को मिल रहा है और इसी के कारण एक पुराना पुलिस अधिकारी आज ना केवल राजनेताओं वाली भाषा बोल रहा है और काम कर रहा है बल्कि अपने आपको मोदी के चाण्क्य के रूप में भी पेश करने की कोशिश कर रहा है। यहां मामला केवल एम जे अकबर अथवा सीबीआई में महाभारत के प्रकरणों का ही नही है। इससे पहले भी बल्कि शुरूआत से ही अजीत दाभोल मोदी सरकार के लिए इस प्रकार के कुटनीतिक और राजनीतिक काम करते रहे हैं। बैंकाक में पाकिस्तान के एनएसए से गुपचुप मीटिंग हो अथवा मोदी की ट्रंप से पहली मुलकात अथवा डोकलाम में चीन का दखल दोभाल विदेश नीतियों से जुड़े सारे कामों में सक्रिय दिखाई पड़े हैं। बेशक इसके लिए चाहे मोदी ने  विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री की भूमिका को ही सीमित क्यों नही कर दिया हो। 

हालांकि अजीत दोभाल की भूमिका पर पहली बार सवाल नही उठ रहे हैं। आईबी में काम करते हुए भी उनकी भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। उत्तर पूर्व में अपनी नियुक्ति के समय उन्होंने एक अलग ही इतिहास रच डाला था। उनके रहते ही ऐसा पहली बार हुआ कि आइजोल में एयरफोर्स ने अपने ही नगरिकों पर बमबारी की। हालांकि आईबी में जाने से पहले उनकी नियुक्ति केरल के थल्लशेरी में हुई थी जहां उनके कार्यकाल में थल्लशेरी का 1971-72 का कुख्यात सांप्रदायिक दंगा हुआ था। वैसे उस समय के उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने दंगे को रोकने में काफी अच्छी भूमिका निभायी थी। आईबी में आने के बाद उनके नागा विद्रोहियों से रिश्ते भी काफी चर्चा का विषय रहे थे। एक समय सेना के हवलदार रहे और बाद में प्रसिद्ध नागा नेता के रूप में जाने गये लालडेन्गा और उनके छह करीबी सेनापतियों से भी उनके बढ़िया रिश्ते उत्तर पूर्व में रहते हुए बताये जाते हैं। उनके इन रिश्तों को लेकर काफी किस्से कहे सुने जाते हैं। और ऐसा नही है कि उनके रिश्ते केवल उत्तर पूर्व के विद्रोहियों से ही रहे हों खालिस्तान के अलगवादियों से उनके रिश्तों की कहानियां हैं। पाकिस्तान में भी उन्होंने सात साल गुजारे हैं और वह स्वयं भी अपनी उपलब्धियों की कहानियां सुनाते हैं। हालांकि उनको जानने वाले अथवा उनके समकालीन दूसरे लोग उनकी कहानियों पर सवाल भी खड़े करते रहे हैं। यहां तक भी कहा जाता है कि अपने इन्ही रिश्तों और कम करने के तरीके के कारण वह अपने एक पूर्ववर्ती राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के निगरानी राडार पर भी थे। 

दाभोल की कहानियों की मौलिकता पर और उनके किस्सों के उपर बेशक सवाल उठते रहे हों परंतु यह तय है कि उनकी कार्यशैली में कभी भी वह पारदर्शिता नही रही है जिसकी एक लोकतांत्रिक प्रणाली में आवश्यकता होती है। हालांकि कईं लोग उनकी इस शैली को उनकी संघ से करीबी और उसके साथ वैचारिकी प्रतिबद्धता से भी जोड़कर देखते हैं। क्योंकि संघ की कार्यप्रणाली भी ठीक इसी प्रकार की रहस्यात्मकता से भरपूर मानी जाती है। संघ की सदस्यता से लेकर विभिन्न जन संगठनों से उसकी संबद्धता तक सभी इसी प्रकार कानून से परे और अपारदर्शी होता है। 

मौजूदा दौर में मोदी सरकार में जिस प्रकार सारी शक्तियां सिमटकर दो तीन हाथों में चले जाने अथवा पूरी तरह से पूरी सत्ता सिमटकर नरेन्द्र मोदी में समाहित हो जाने की चर्चाएं राजनीतिक हलकों में होती रही हैं। उससे मोदी की कार्य प्रणाली का पता चलता है। ऐसी अपारदर्शी और केन्द्रित सत्ता के राजनेता को हमेशा एक ऐसे औजार की जरूरत रहती है जो गुपचुप तरीके से इस सत्ता को मजबूत करने के लिए हरेक कानूनी, गैर कानूनी काम करने में माहिर हो। मोदी की यही आवश्यकता एक निरंकुश और बेलगाम पुलिस वाले को अपना चाणक्य बनाने की आवश्यकता को जन्म देती है। और मनमर्जी से कुछ भी करने वाला यह एक पुलिसिया अधिकारी इसी आवश्यकता को पूरी कर रहा है। इसीलिए वह अपने मास्टर का चाणक्य बन रहा है।  

बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

सीबीआई के महाभारत में बाहर आ रहा है मोदी सरकार का कीचड

जिस प्रकार से सीबीआई के स्पेशल निदेशक राकेश अस्थाना को बचाने के लिए मोदी सरकार मैदान में उतरी है और अपने आप को निष्पक्ष दिखाने के लिए सीबीआई के नंबर 1 और नंबर 2, दोनों को छुट्टी पर भेजकर अस्थाना को बचाने का प्रयास किया जा रहा है उससे मोदी सरकार के आखिरी दिनों में मोदी सरकार का सारा कीचड सड़क पर आता दिखाई पड़ रहा है। 

मोदी सरकार की इस कार्रवाई पर राहुल गांधी समेत पूरे विपक्ष ने हमला बोलते हुए मोदी पर सीधे आरोपों की झडी लगा दी है। कांग्रेस अध्यक्ष और लगभग पूरे विपक्ष ने एक सुर में आरोप लगाया है कि सीबीआई चीफ ने एजेंसी के अधिकारियों को राफेल मामले में सबूत जुटाने के आदेश दे दिये थे जिस कारण से उनकी छुट्टी कर दी गयी है। 

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के विवाद में दोनों को छुट्टी पर भेजे जाने की बात सरकार के वकील सह वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कही है। परंतु सवाल यह उठता है कि सीबीआई के नंबर 1 और नंबर 2 को तो आपने छुट्टी पर भेज दिया परंतु अस्थाना के मामले में सीबीआई द्वारा बनाई गयी जांच टीम को कालेपानी की सजा क्यों दे दी गयी है। ध्यान रहे, इस मामले की जांच कर रहे जांच अधिकारी का बस्सी का भी सरकार ने अन्डमान तबादला कर दिया है। यहां तक कि पूरी की पूरी जांच टीम को हटा दिया गया है। इससे साफ जाहिर है कि सरकार की नीयत मामले को ईमानदारी से सुलझाने की नही बल्कि अस्थाना को बचाने की अधिक जान पड़ती है। 

छुट्टी पर भेजे के जाने के बाद जिस तरह से आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है उससे साफ जाहिर है कि मामला अभी और पेचीदा होने वाला है। ध्यान रहे, कि सरकार द्वारा अवकाश पर भेजे जाने के बाद आलोक वर्मा ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। जिस पर कार्ट शुक्रवार को सुनवाई करने वाला है। यदि वर्मा को इसमें कोई राहत मिलती है और उन्हें कोर्ट बहाल कर देता है तो सरकार के लिए बड़ी मुसीबतों की शुरूआत हो सकती है। 

सरकार ने कहा है कि निष्पक्ष जांच के लिए दोनों को हटाया गया है। और जेटली ने सीवीसी का हवाला देते हुए कहा कि सीवीसी की सिफारिश पर दोनों को हटाया गया है। परंतु यहां सरकार और सीवीसी दोनो की नीयत पर भी सवाल उठते हैं। राकेश अस्थाना के खिलाफ सीवीसी और पीएमओ के पास अर्से से शिकायते हैं दोनों ने उस पर क्या कार्रवाई की और क्यों कोई जांच नही करायी। मोदी के करीबी और चहेते माने जाने वाले अस्थाना को जब स्पेशल निदेशक नियुक्त किया गया था तभी जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाये थे। यहां तक कि वह इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक भी चले गये थे। परंतु सकरार ने फिर भी अस्थाना की नियुक्ति की। बाद में आलोक वर्मा ने भी अस्थाना की नियुक्ति पर सवाल उठाये थे। यहां तक कि उन्होंने अस्थाना के खिलाफ सीवीसी को भी लिखा था। अब जो सीवीसी निष्पक्षता की बात करते हैं उनकी नियुक्ति के समय भी उनकी नियुक्ति पर सवाल उठ चुके हैं। और ध्यान रहे कि सहारा-बिडला डायरी केस में रिश्वत दिये जाने को मामले को बंद करने वाले यही सीवीसी थे। याद रहे, सहारा-बिडला डायरी मामले में मोदी का नाम सीधे तौर पर लिप्त था। बावजूद इसके कि नीचे के अधिकारियों ने इस मामले में जांच की आवश्यकता बतायी थी मौजूदा सीवीसी ने इसकी जांच की जरूरत को खत्म कर दिया था। अब मोदी के पंसदीदा वही सीवीसी निष्पक्षता की बात कर रहे हैं। 

जहां तक राकेश अस्थाना की बात है वह चारा घोटाले में लालू को फंसाने वाले और गोधरा में गुजरात की मोदी सरकार को बचाने वाले अधिकारी के बतौर जाने जाते हैं। अब जिस प्रकार से तमाम शिकायतों के बावजूद अस्थाना का बचाव इस सरकार ने किया है उससे जाहिर है कि यह सरकार अस्थाना को बचाने के लिए यह तमाम कसरत कर रही है। उसकी निष्पक्षता का राग ही अस्थाना को बचाने के लिए है। 

परंतु आलोक वर्मा की तत्परता और कोशिशों को देखकर लगता है कि वह सरकार से दो दो हाथ करने के मूड में जान पडते हैं। यदि वर्मा ने सरकार द्वारा अस्थाना को बचाने की लड़ाई में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो मोदी सरकार के आखिरी दिनों में मोदी सरकार का साढ़े चार साल का जमा हुआ सारा कीचड़ निकलकर बाहर आ जायेगा। 

पूरे मामले में यह भी ध्यान देने की बात है कि सीबीआई चीफ ने अस्थना के खिलाफ छह मामलों में एफआईआर दर्ज करायी है। और बदले में अस्थाना ने जो सतीश सना के बयान के हवाले से आलोक वर्मा को फंसाने की कोशिश की है वह शुरूआती दौर में ही कोर्ट में ध्वस्त हो जायेगा। यह बयान दिल्ली में दर्ज कराया दिखाया गया है और जिस तारीख में यह रिश्वत मामले का बयान दर्ज कराया गया है उस तारीख में बयान देने वाला सना दिल्ली में था ही नही। इसके अलावा सना उसी कुरैशी नेटवर्क का आदमी है जिससे मोदी रिश्वत खाने के केस में अस्थाना पर एफआईआर हुई है। बहरहाल, मामला पूरी तरह से साफ है कि मोदी और उनकी सरकार उस अस्थाना को बचाने का प्रयास कर रही है जिस पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं और जिसमें मोदी को गोधरा से लेकर गुजरात दंगों की जांच तक में कई बार लाभ दिया है। 

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

पुलिस, परिवहन और निगम का भ्रष्टाचार बढ़ा रहा है दिल्ली का प्रदूषण

नई दिल्लीः दिल्ली की आबोहवा में सांस लेना मुसीबत को दावत देना बनता जा रहा है। ग्रीन ट्रिब्यूनल से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लगातार प्रदूषण के बढ़ते स्तर का संज्ञान लेकर केन्द्र और राज्य सरकार से जवाब तलब करते रहे हैं। परंतु दोनों सरकारें कोर्ट में शपथ पत्र देकर न्यायपालिका को गुमराह करने के अलावा कुछ भी नही कर रही हैं। इसका जिन्दा सबूत है दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के एक मुख्य कारण भ्रष्टाचार पर दोनों सरकारों का आंखे मूंदे रहना और हालात को बिगड़ते हुए देखकर भी खामोश रहना। यहां तक कि शिकायत किये जाने पर पुलिस और नगर निगम और विभागों को तो छोड़िये केन्द्र सरकार के अनुसार दिल्ली का वास्तविक प्रशासक कहे जाने वाले उप-राज्यपाल महोदय का सचिवालय भी ऐसी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नही करता है और खामोश बना रहता है। 
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण को नियन्त्रित करने के मद्देनजर डीजल बसों पर काफी पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने रोक लगा दी थी। परंतु प्राइवेट बस आपरेटरों का लालच और दिल्ली पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार गठजोड़ ने ग्रीन ट्रिब्यूनल की कोशिशों पर ना केवल पानी फेर दिया है बल्कि दिल्ली को यूपी और हरियाणा नम्बर की डीजल बसों अवैध ठिकाना बनाकर छोड़ दिया है। यह दिल्ली में चलती अवैध बसें बगैर रूट परमिट के दिल्ली यूपी और अन्य पड़ोसी राज्यों के विभिन्न रूटों पर नियमित रूप से चलती हैं, जो ना केवल दिल्ली के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं बल्कि राजस्व की दिन दहाड़े लूट भी है। उत्तर पूर्वी दिल्ली के कुछ लोगों ने इनके खिलाफ शिकायत की तो स्थानीय पुलिस अधिकारी कभी इसे ट्रेफिक पुलिस का मामला बताते रहे और कभी नगर निगम के अधिकार क्षेत्र का मामला। यहां तक कि थाना वेलकम के पूर्व थानाध्यक्ष प्रशांत कुमार ने तो उनके थाना क्षेत्र में इन बसों की अवैध पार्किंग और अवैध संचालन पर सीधे दो टूक जवाब देते हुए कहा कि इसमें हम क्या कर सकते हैं। यह तो नगर निगम का मामला है। इसी प्रकार का रवैया बाकी पुलिस विभाग का भी है। 
- इस प्रकार के अवैध बस संचालन के केवल उत्तर पूर्वी दिल्ली में ही दर्जनों ठिकाने हैं। इनकी सवारियां और सामान उठाने के कई ठिकाने यमुनापार के विभिन्न इलाकों में बने हुए हैं, जिन्हें इनके छोटे अन्तर्राज्यीय बस अड्डे भी कहा जा सकता है। इनके इन ठिकानों में सीलमपुर मेट्रो स्टेशन के पास, शास्त्री पार्क में एचपी गोदाम के पास, यमुना विहार सी-12 के पास, कर्दमपुरी मौजपुर रोड़, मेट्रो स्टेशन जाफराबाद के पास, शाहदरा उत्तरी जोन निगम कार्यालय के पास, रोड़ संख्या 65 मुस्कान के सामने, खजूरी चैक के पास, भजनपुरा के पास, गांवड़ी रोड़ यमुना पुश्ता, श्मामलाल काॅलेज के सामन और बिहारी कालोनी रोड़ कांति नगर के पास इनके यह अवैध बस स्टैंड अथवा बस अड्डे हैं। यहीं से यह निजी बसों का यह माफिया तमाम कानूनों और नियमों को ताक पर रखकर अपना अवैध रूट चलाने का कारोबार करता है। 
-इन बसों की शिकायत बाकायदा नंबर सहित पहले संयुक्त पुलिस आयुक्त ट्रेफिक को उनके फेसबुक पेज पर दी गई और उसके बाद उपरोक्त शिकायत को ऐसी ही 30 से 40 बसें के नंबर और उनके उपरोक्त संचालन के ठिकानों के साथ उप-राज्यपाल कार्यालय को दी गई। परंतु कोई कार्रवाई अभी तक नही हुई। 
-संचालन से जुडे़ कुछ लोगों के अनुसार केवल उत्तर पूर्वी दिल्ली जिले से ही ऐसी अवैध रूट की 200 के लगभग बसों का संचालन होता है। 
-दिल्ली से मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, अमरोहा, गजरौला, संभल, हसनपुर आदि उत्तर पूर्वी दिल्ली से चलने वाली बसों के प्रचलित रूट हैं। यह बसें नियमित रूप से सवारियां और सामान ले जाने का काम करती हैं। 
-नगर निगम की चुंगियों पर भी अक्सर यह बसे बगैर रसीद के पैसा चुकाकर दिल्ली में निगम के कर्मचारियों की मिलीभगत से दाखिल होती हैं।
-दिल्ली के हर चौराहे के ट्रेफिक अधिकारी इन्हे बगैर अवरोधः के जाने देते है! शिकायत  जाने पर औपचारिकता के लिए मामूली चालान काट दिया जाता है बस को जब्त नहीं किया जाता है ! जाहिर है दोनों के बीच कोई समझदारी कोई व्यवस्था कायम है !  
-पुलिस से इनकी मिलीभगत किस स्तर पर है इसका सबसे बड़ा सबूत इनका उत्तर पुर्वी दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त कार्यालय के बाहर से संचालन है। अंधेरा होते ही पुलिस उपायुक्त कार्यालय के बाहर पेट्रोल पंप पर कतार से खड़ी बसें अराजक भ्रष्टाचार की कहानी बयां करती है। 
-यही हाल शाहदरा उत्तरी जोन के नगर निगम कार्यालय का भी है। जिसके सामने से और पीछे से ऐसी दर्जन भर से ज्यादा बसे अलग अलग समय पर संचालित होती हैं। 
-अक्टूबर महीने में एसीपी सीलमपुर से शिकायत करने पर जब एसीपी सीलमपुर की सख्ती के बाद कुछ बसें थाने में कईं दिनों के लिए बंद कर दी गई तो अवैध बस आपरेटर माफिया ने ग्रामीण सेवा और वेन से सवारियों को यूपी बार्डर ले जाने का कारोबार किया था। जिससे यह तथ्य सामने आ गया था कि इन बसों का संचालन अवैध है और इन्होंने दिल्ली में अवैध तरीके से अपने अन्तर्राज्य बस अड्डे बना रखे हैं। जहां से ये लोग रोजाना सवारियां और सामान ले जाते हैं।
-दिल्ली के परिवहन विभाग ने 2016 और 2017 में कईं बार अवैध बसों को जब्त करने का दावा किया है। यहां तक कि जून 2017 में दिल्ली सरकार ने ऐसी 1000 अवैध बसों को जब्त करने का दावा किया था और 24 जून 2017 के अखबारों में यह खबर प्रकाशित हुई थी। परंतु मालूम नही दिल्ली सरकार की अवैध बसों की परिभाषा क्या है। क्योंकि दिल्ली में अभी भी विभिन्न रूटों पर ऐसी अवैध डीजल बसें धुंए के गुब्बार उडाती घूमती हैं।    
-29 सितंबर 2017 को रात 10.30 बजे वेलकम थाना क्षेत्र की जनता कालोनी के एक व्यक्ति की बाईक ऐसी ही बसों के तथाकथित बस स्टैंड की दो यूपी नंबर बसों के बीच से चोरी हो गयी शिकायतकर्ता के लाख गुहार करने पर भी एफआइआर में उपरोक्त अवैध रूट की बसों का जिक्र नही किया गया। शिकायतकर्ता के जोर देने पर शिकायत दर्ज करनेे वाले पुलिसकर्मी ने कहा कि तुम्हें एफआइआर से मतलब है कि इन बसों से हम बसों का हवाला नही देंगे रिपोर्ट में।
-उपरोक्त मामले की शिकायत पुलिस उपायुक्त उत्तर पूर्वी दिल्ली जिले को की गई कोई कार्रवाई नही हुई। अवैध बसे अपनी जगह पर हैं, एफआइआर से बसों का हवाला गायब करने वाला पुलिसकर्मी सुरक्षित है। 
दरअसल, दिल्ली शहर की राज्य सरकार और केन्द्र घोषित असली प्रशासक दोनों ही प्रदूषण को काबू में रखने के प्रयासों के दावें तो करते हैं परंतु वे कागजी और शपथपत्र तक ही सीमित होते हैं और न्यायपालिका और शहर की जनता को गुमराह करने वाले होते है। वास्तव में गैस चैंबर बनती दिल्ली और दिल्लीवासियों की इस क्रूर राजनीतिक खेल को कोई परवाह नही है। यदि परवाह होती तो केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाकर ही प्रदूषण के आधे जहर को कम किया जा सकता था। लेकिन ऐसा हो नही रहा है जो दिल्ली के दोनों प्रशासकों चुने हुए और नियुक्त किये हुए की नेकनीयती और कोशिशों पर सवाल उठाता है।