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सोमवार, 4 मार्च 2019

मताधिकार छीनने पर मुख्य चुनाव अधिकारी के नाम एक खुला पत्र


मताधिकार छीनने पर मुख्य चुनाव अधिकारी के नाम एक खुला पत्र 

मुख्य चुनाव अधिकारी महोदय,
मैं दिल्ली का एक नागरिक अपने मतधिकार छीनने की राजनीतिक साजिश पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हंू। मैं नब्बे के दशक से दिल्ली का एक वोटर था और 1994 में मेरा और मेरे परिवार का वोटर कार्ड बना था। जिसे कुछ सालों बाद अपरिहार्य कारणों से रद्द कर दिया गया और मुझे और मेरे परिवार को मताधिकार से वंचित कर दिया गया। उसके बाद मेरे द्वारा प्रतिकार किये जाने पर फिर से मेरा वोट वापस बहाल किया गया। फिर कुछ सालों बाद जांच करने पर मुझे मालूम चला कि मेरा मताधिकार फिर से अपरिहार्य कारणों से छीन लिया गया है। उसके बाद मैंने पिछले दिनों 20 जनवरी 2019 को मैंने फिर से वोट बनवाने के लिए आॅनलाइन आवेदन किया। मेरे साथ मेरी पत्नी और बेटे ने भी वोट बनवाने के लिए आनलाइन फार्म 6 के माध्यम से आवेदन किया था।
हमारे आवेदन के जवाब में एक आंगनवाडी वर्कर हमारे निवास पर आयी और हम तीनों के आवश्यक कागजात हमारे फोटो के साथ ले गयी और कहा कि जल्द ही यह वोट बन जायेगा और हमारा वोटर कार्ड आ जायेगा। परंतु आज 3 मार्च 2019 को जब मैंने आपकी वेबसाइट पर अपने स्टेटस की जांच की तो मालूम चला कि हमारा आवेदन रद्द कर दिया गया है। कारण हमने फोटो नही दिया और हम घर पर नही थे जबकि हम तीनों आवेदक घर पर मौजूद थे और हमने उक्त आंगनवाडी वर्कर को आवश्यक कागजात सौंपे थे।
हमारे आवेदन पर जांच करने आयी महिला अधिकारी द्वारा स्टेटस रिपोर्ट में एक अन्र्तविरोध है जो उक्त अधिकारी के झूठ को उजागर करता है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह कहा कि आवेदक ने फोटो नही दिये और आवेदक सुनवाई के दौरान मौजूद नही थे। यदि हम उनकी जांच/सुनवाई के दौरान मौजूद नही थे तो उन्हें फोटो देने से इंकार करने का सवाल ही नही है और यदि हमने फोटो देने से इंकार किया तो जाहिर है कि आवेदक मौजूद थे। उनकी स्टेटस रिपोर्ट ही उनकी शरारत भरे कृत्य को उजागर करती है। उक्त आंगनवाडी वर्कर पर तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए अन्यथा वह अपने शरारती राजनीतिक हितों की खातिर भविष्य में इसी प्रकार का नुकसान नागरिकों और समाज को करती रहें्रगी। मेरे आवेदन का रेफरेंस आईडी नं. OLI031761747 है !
अब आप पूरी घटना से समझ सकते हैं कि किस प्रकार एक खास तरह के लोगों को निशाना बनाकर उन्हें उनके मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। यह पूरी घटना उस राजनीतिक साजिश की तरफ इशारा करती है जिसकी तरफ पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इशारा किया था और उन दिल्लीवासियों के मताधिकार छीनने पर सवाल उठाये थे जो राजनीतिक तौर पर भाजपा विरोधी के बतौर जाने और पहचाने जाते हैं। आशा है आप इस पूरी घटना को गंभीरता से लेते हुए संबन्धित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करेंगे।

महेश राठी
353, दुर्गा पुरी विस्तार
दिल्ली-110093

मो. 9891535484

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

जंग

             महेश राठी

जंग में,
कभी कोई नही जीतता है
सभी बस हारते हैं
जंग में,
हमेशा,
सिर्फ और सिर्फ
जंग ही जीतती है।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

हमने नीरो पाला है।


         महेश राठी 

हमने नीरो पाला है
इतराता हुआ 
इठलाता हुआ
फोटो खिंचवाता हुआ।

हमने नीरो पाला है
बांसुरी बजाता
हैट लगाता
नये मुखौटे बनवाता
हर बार खुद पर ही 
अभिभूत हो जाता। 

हमने नीरो पाला है
कम तोलता
ज्यादा बोलता
जनता की दौलत पर 
लालच में डोलता
यारो के लिए खजाने खोलता

हमने नीरो पाला है
मजदूरों को हडकाता
किसानों को लडवाता
जवानों को मरवाता
हमने नीरो पाला है।  

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

अवध आपको बुलाता है !

                                   - महेश राठी 

तुमने देखा है कभी 
काला सूरज,
या 
सरपट गति को रोकते
हिनहिनाते घोडे़
या देखे हो कभी
मरघट में गाये जाते
जीवन के गीत
या देखें हो कभी
कहर की आंखों में
गम के आंसू
क्या देखे हैं कभी
पिशाचों के प्रलाप में
लोरी की थाप की तरह उंघते बच्चे
देखा तो ना होगा कभी
सूरज को लील कर
बढ़ता हुआ उजाला
या फिर
विकास के दस्तख्त वाले
तबाही के फरमान!
तो आइये,
अवध आपको बुलाता है।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

एक के बदले दस सर की असली राजनीति

महेश राठी

आठ जनवरी 2013 को जम्मू-कश्मीर के पास कृष्णा घाटी में मथुरा निवासी सेना के लांस नायक हेमराज  शहीद हो गए। पाकिस्तानी फौज ने उनके साथ एक और जवान सुधाकर सिंह का सिर कलम कर दिया था। उसके बाद हेमराज की शहादत पर राजनीति का मोर्चा खुल गया। आज के प्रधानमंत्री और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर सुषमा स्वराज, जनरल वी के सिंह से लेकर भाजपा का हरेक छोटा बडा नेता शहीद हेमराज की शहादत पर बयानबाजी करने वाला बयान बहादुर बन बैठा था। शहीदों के साथ नाइंसाफी की बातें की गयी एक के बदले दस सर लाने के जुमले गढ़े गये और गरमा गरम उकसावे वाले भाषणों की देशभर में बाढ़ सी आ गयी। परंतु बयान बहादुरों की सरकार को पांच साल होने को हैं और हेमराज की शहादत को छह साल बीत गए है लेकिन शहीद हेमराज और उनका परिवार आज भी मदद के लिए दर दर भटक रहा है। देशभक्त नेताओं के वादे जुबानी जमाखर्च और उनकी सरकार के वादे बस कागजों पर ही है।

शहीद हेमराज की पत्नी धर्मवती और उनके तीन बच्चे बीते छह साल से एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन अब तक न तो उन्हें सरकारी नौकरी मिली है और न ही पेट्रोल पंप यहां तक की मथुरा के कैंट इलाके के जिस क्वार्टर में हेमराज की विधवा अपने बच्चों समेत रह रही हैं, उसे भी खाली करने के नोटिस मिलन लगे हैं। लगता है कि शहीद हेमराज के परिवार के साथ देशभक्ति के ठेकेदारों की करतूत यदि ज्यादा उजागर हो गयी तो हो सकता है कि सजा के तौर पर उनके परिवार को सरकारी क्वार्टर से बाहर ही कर दिया जायेगा।


हेमराज की शहादत को छह साल बीत गये और ऐसा नही है कि उनकी विधवा धर्मवती ने सरकार के  सामने अपनी फरियाद करने की कोशिश नही की है। शहीद की विधवा धर्मवती ने सभी देशभक्त नेताओं और राज्य के मंत्रियो से लेकर देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह तक से भी फरियाद की और दफ्तरों के चक्कर काट काटकर वह अब थक चुकी हैं। उनका कहना है कि आने जाने का भाड़ा लग जाता है मगर काम होता नहीं। लिहाजा अब घर बैठ गए हैं। यह वही शहीद हेमराज हैं, जिनकी शहाद पर नरेंद्र मोदी से लेकर सुषमा स्वराज ने चुनावी भाषणों में एक के बदले पाकिस्तान से दस सिर लाने के दावे किए थे।  हेमराज की शहादत के बाद बीजेपी ने कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। जमकर इस मुद्दे पर राजनीति भी हुई। लेकिन देशभक्ति के ठेकेदार मोदी की सरकार शहीद हेमराज के परिवार को भूल चुकी है। यहां तक कि हेमराज की विधवा धर्मवती ने तीन बार पीएम मोदी से मिलने की कोशिश की परंतु उन्हें वक्त तक नही दिया गया। और तो और मथुरा से सांसद हेमामालिनी भी कभी हेमराज के गांव में नही आयी।


यही नहीं सरकार से मिले 25 लाख रुपए में 10 लाख रुपए का फर्जीवाड़ा भी उनकी पत्नी के साथ हो चुका है। जब सेना का जवान बनकर आया एक व्यक्ति झांसा देकर दस लाख रुपये लेकर फरार हो गया था। हेमराज की पत्नी की पेंशन इतनी नहीं है कि उससे तीन बच्चों की पढ़ाई हो सके। यह खबर पाकर एक समाजसेवी संगठन ने परिवार के मेडिकल और बेटी की पढाई का खर्चा उठाने का निर्णय लिया है। मीरा श्री चेरिटेबल की मेंबर नंदनी सहरावत ने कहा कि जब हम इनके गांव गए तो हमने देखा कि पेंशन से कैसे तीन बच्चों को पढ़ाया जा सकता है, बहुत दिक्कत होती है मैं औरत हूं समझती हूं। इसलिए हमने खर्चा उठाने का फैसला किया है। यही नहीं हर साल हेमराज की शहादत दिवस 8 जनवरी को उनके गांव में मनाया जाता है उसका खर्च भी हेमराज की पत्नी खुद वहन करतीं हैं।

नंदनी सहरावत ने देशभक्ती की राजनीति करने वाले नेताओं की हरकत का बेहद शर्मनाक किस्सा बताया। उन्होंने कहा कि जब वह हेमराज के गांव गयी तो देखा कि 8 जनवरी को हेमराज की शहादत दिवस का सारा खर्च धर्मवती खुद ही वहन करती हैं और उनके खर्च पर बनाये गये बडे स्टेज पर चढ़कर नेता लंबे लंबे भाषण ठोककर चले जाते हैं। यहां तक कि शहीद की विधवा के पैसे से इस समारोह में बनने वाले पकोडे, समोसे और चाय, पानी पीकर और सरकार की वादा खिलाफी और दगाबाजी पर खामोश रहकर हेमराज की शहादत को भुनाने के लिए ये नेता नये जोशीले भाषण पेलकर चुपचाप निकल जाते हैं।

सशस्त्र सेना के एक शहीद से दगाबाजी की यह कहानी केवल हेमराज के परिवार से वादाखिलाफी की ही नही यह डायरेक्टोरेट आफ एक्स सर्विसमैन वेलफेयर की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खेडे कर रही है। शहीद हेमराज के परिवार को भटकते देख पूर्व सैनिकों में भी खासी नाराजगी है। असल में, डायरेक्टोरेट आफ एक्स सर्विसमैन वेलफेयर की स्थापना पूर्व सैनिकों की मदद के लिए हुई थी, मगर इस संगठन का संचालन कोई फौजी नही करते हैं बल्कि वहां आईएएस अफसर कब्जा जमाकर बैठे हैं, उन्हें शहीदों और सैनिकों के परिवारों से क्या लेना-देना। और उन्हें न सैनिकों की शहादत का पता है और ना ही उसके बाद शुरू होने वाली उनके परिवारों की समस्याओं का। बहरहाल, हेमराज की शहादत पर राजनीति देशभक्ति की ठेकेदारी करने वाली राजनीति का एक शर्मनाक और भयावह चेहरा है। हेमराज मामले में राजनीति केवल शहीदों को इंसाफ दिलाने के नाम पर खोखली नारेबाजी और जुमलेबाजी तक सीमित नही थी बल्कि इस राजनीति ने हेमराज और शहीद सुधाकर के सर कटने की दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी को भी अपने सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल कर डाला और एक के बदले दस सर का जुमला गढ़ा और उसे सत्ता मिलने तक खूब बेचा और सत्ता में आने के बाद मानो कह दिया हो कि शहीदों के सर-धड सब भाड में जायें।

शहीद का परिवार केंद्र और राज्य सरकार की उपेक्षा से बेहद नाराज है। परिवार वालों का कहना है कि जिस बेटे ने मुल्क की सुरक्षा के लिए दुश्मनों से लड़ते हुए सिर तक कटा दिया, उसकी ऐसी उपेक्षा से हम टूट चुके हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार ने हेमराज की शहादत के बाद जो वादे किए थे वो एक भी पूरा नहीं किया। परंतु जिन सरकारों से शहीद हेमराज का परिवार नाराज है, खफा है उनके लिए फिर से जुमले गढ़ने और जवानों की लाशों को बेचने का मौसम आ गया है। फिर भाषण हो रहे हैं, जुमले गढ़े जा रहे हैं। नेताओं से लेकर घटिया टीवी ऐंकर तक सभी युद्धोन्माद फैलाने में जान झौक रहे हैं। 2014 के चुनाव की तैयारी में शहीद हेमराज और शहीद सुधाकर के सर दांव पर थे तो 2019 की तैयारी में 44 लाशें और उनके क्षत विक्षत शरीर चुनावी बिसात पर हैं। जो कल तक हेमराज और सुधाकर के सर बेचने की सियासत में वकील थे, वो आज बेशक पुलवामा में गिरी लाशों के गुनहगार हों मगर लाशें बेचने के फन में वो इतने माहिर हैं कि हर लाश उनके फायदे का ही सौदा बन जाती है। 

मदारी और मैं

महेश राठी

भीड को बरगलाते एक आदमी को रोकने के लिए मैंने उसे ना कहते हुए "न" शब्द दिखाया
मेरा ही "न" दिखाते हुए उसने कुछ लोग जोडे और उन्हें समझा दिया कि मैंने उसे नेता बताया !

मैंने समझ लिया उसका शातिरपन और उसे एक शब्द "श" दिखाया
मेरा "श" पकड वह भीड के सामने जोर जोर से चिल्लाया कहा, मैंने उसे शानदार कहा !

मैं उससे नाराज हुआ उसे मक्कार बताकर फिर एक शब्द "म" उसे दिखाया
मेरा "म" लिये वह भीड के सामने घण्टों बोला कहा, मैंने उसे महान बताया !

मुझे अफसोस था उसके फरेबी पाखण्ड पर और उसे "प" शब्द दिखा दिया
अब वह ताली पिटते भीड़ कोे समझा गया कि मैंने उसे बडा पाबन्द बताया !

मेरा आक्रोश सीमा लांघ गया, मैंने उसे कहा उन्मादी और दिखाया "उ"
वह फिर सीना पीट पीटकर और हाथ उछाल उछालकर लोगों को समझा गया, मैंने उसे नई उम्मीद कहा !

अब 2019 है,
उसे उम्मीद है मैं उसे फिर दूंगा फिर एक मौका दिखाउंगा एक नया शब्द
वह फिर बदल देगा उसके मायने, बन जायेगा दोबारा नई मिसाल !

मगर अब मैं चुपचाप, खामोश सहला रहा हूँ अपनी उंगलियां
ख़ामोशी से कर रहा हूँ इंतजार बटन दबाने का !  

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

इंक़लाब जिन्दा है

मेरी माँ
दीवार पर टँगी एक
 तस्वीर दिखाती थी,
नई दुनिया की राह बताती थी,
एक दिन इंक़लाब आयेगा समझाती थी !
मेरे पिता,
एक सपने के लिए लड़ने गए हैं
वो बताती थी !
सपना जो इंक़लाब है,
सपना जो नया ख्वाब है,
जब आएगा इंक़लाब, लौटेंगे पिता !
हल पर कसी मुट्ठी से
नहीं छीने जायेंगे निवाले !
पहाड़ तोड़ने वाले हाथों को
नहीं होगा टूट जाने का डर !
सदियों के सीनों पर अब
नहीं बनेंगी दर्द की तस्वीरें !
रेशमी बदनों पर बनी खरोंचे
नहीं बना करेंगी मर्दानगी के सबूत !

इतिहास की करवट के बीच,
शहर की चमक में आता हूँ !
माँ की कहानियों में झूठ,
पिता के सपने में नाउम्मीदी पाता हूँ !

मगर, अब भी जब कभी
किसान की बेवजह मौत,
दिहाड़ी के बदले मजदूर को मिली दुत्कार,
बार बार खरोंचे जाने का दस्तावेज बनी,
औरत की देह को सामने पाता  हूँ,
तो, मेरी माँ  की झूठी कहानियों,
पिता के नाकाम सपने को तलाशने,
अपने भीतर उतर जाता हूँ,
तो उस इंक़लाब,
उस नए ख्वाब को,
अपनी माँ,
अपने पिता को
अभी भी,
खुद में जिन्दा पाता हूँ !