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गुरुवार, 6 जनवरी 2011

नेतृत्वविहीन विपक्षी एकता के खतरे

महेश राठी
पिछले साल के घोटालों और उन पर विपक्षी एकता से परेशान कांग्रेस के लिए बोफोर्स घोटाले पर आयकर ट्रिब्यूनल का निर्णय मुसीबतें बढ़ाने वाले पुराने दर्द की नई टीस की तरह है। आयकर ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बोफोर्स मामले में विन चड्ढा और ओट्टावियो क्वात्रोची को 41 करोड़ की दलाली दी गई थी। इस आदेश से 2010 में खुले 2जी स्पेक्ट्रम और आदर्श घोटाले से घिरी कांग्रेस की मुश्किलें तो बढ़ ही गई हैं, वहीं गत दिनों में सत्ता का राजननीतिक औजार बनी और आरुषि मामले में फजीहत झेल रही सीबीआइ की परेशानियां भी बढ़ गई हैं। ट्रिब्यूनल का यह आदेश ऐसे समय आया है, जब इसके अगले ही दिन दिल्ली उच्च न्यायालय को क्वात्रोची के खिलाफ आपराधिक मामलों को बंद करने की सीबीआइ की अपील पर सुनवाई करनी थी। निस्संदेह बोफोर्स पर आयकर ट्रिब्यूनल के आदेश से कांग्रेस के खिलाफ पिछले संसद सत्र में बेहद आक्रामक नजर आने वाले विपक्ष को नई ऊर्जा मिलेगी। ट्रिब्यूनल आदेश पर भाजपा के अरुण जेटली और भाकपा के डी राजा की तुरंत प्रतिक्रिया से भी इस विपक्षी उत्साह के ही संकेत मिलते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम पर जेपीसी गठन के सवाल पर रक्षात्मक मुद्रा में नजर आ रही कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के खिलाफ दक्षिणपंथी से लेकर वामपंथी तक यानी पूरा विपक्ष एकजुट दिखाई पड़ रहा है। इस ऐतिहासिक एकता से विपक्ष पूरी तरह अभिभूत है। यह विपक्षी खुशी की घटना हो सकती है और कई नेताओं की सुप्त महत्वाकांक्षाओं के करवट लेकर उठने और साथ ही नई उम्मीदों के जागने का समय भी है। सदा इतिहास के अवशेषों एवं स्मृतियों के सहारे अपनी राजनीति बढ़ाने वाली भाजपा जहां इस एकता में राजग के पहले सफल कार्यकाल की आहट सुन रही है, वहीं समाजवादी खेमे का कुछ हिस्सा इसे 1989 के अपने ‌र्स्वणकाल की तरह देख रहा है। हालांकि इस विपक्षी एकता की कदमताल में जितनी साझेदारी की लयबद्धता और तालमेल है, इसकी एकजुटता उतनी ही अधिक अनौपचारिक और अंतर्विरोधों की अनुगूंज जान पड़ती है। वर्तमान भारतीय विपक्ष के पास मुद्दे भी हैं और आक्रामकता की धार भी, परंतु विपक्ष के पास इस ऐतिहासिक एकता की केंद्रीय धुरी के रूप में विश्वनाथ प्रताप सरीखा नेता नहीं है। शरद यादव जैसे भारतीय राजनीति के कुछ पुराने पुरोधा दूसरा विश्वनाथ प्रताप सिंह बनने का सपना तो बुन रहे हैं, मगर उनके पास उन परिस्थितियों, उस कद और जनाधार का सरासर आभाव है, जिसने विश्वनाथ प्रताप सिंह को एक कांग्रेसी बागी नेता से देश का प्रधानमंत्री बना दिया। वास्तव में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के उदयकाल में सत्तासीन कांग्रेस के विरोध की तैयार होती जमीन के अतिरिक्त कोई समानता भी नही है। राजनीतिक विरोध के इस माहौल में भी एक बड़ा एवं गुणात्मक अंतर है। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस विरोध की राजनीति को अपने ही गढ़े मुद्दों पर आगे बढ़ाते हुए तुलनात्मक रूप से अधिक व्यापक और स्थायी रोग भ्रष्टाचार पर केंद्रित किया, जबकि वर्तमान भारतीय राजनीति कांग्रेस द्वारा निर्धारित तथाकथित विकास के मुद्दे पर केंद्रित है, वहीं भ्रष्टाचार और महंगाई से निपटने के लिए उसके पास ईमानदार एवं स्वच्छ छवि वाला अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री है। एकताबद्ध विपक्ष का भ्रष्टाचार मुद्दे पर आक्रमण भी विचित्र विडंबना का शिकार है, जहां कांग्रेस और यूपीए पर विपक्ष भ्रष्टाचार के अरोपों के साथ आक्रमण भी करता है तो प्रधानमंत्री को ईमानदारी का प्रमाणपत्र देना भी नहीं भूलता है और इस त्रासदी का इस विपक्ष के पास न ही कोई इलाज है और न ही ऐसा तथाकथित स्वच्छ, ईमानदार और अर्थशास्त्री चेहरा व नाम। दरअसल, विपक्षी एकता के सभी वरिष्ठ नामों का राजनीतिक अनुभव भी समाजवादियों के संघर्षो के ‌र्स्वणकाल जेपी आंदोलन और वीपी सिंह के राष्ट्रीय मोर्चा व जनता दल की राजनीतिक यात्रा से ही आता है। भारतीय राजनीति के इन दोनों पड़ावों की कमोबेश एक ही विशेषता रही है। देश की दो धुर विरोधी राजनीतिक धाराओं दक्षिण और वाम को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक मंच के लिए इस्तेमाल करना, मगर इस्तेमाल की इस राजनीति में भी वीपी सिंह ने सांप्रदायिक भाजपा से सदा एक संतुलित दूरी बनाकर रखी। अब सवाल यह है कि भाजपा नीत राजग का नेतृत्व करने वाले क्या विश्वनाथ प्रताप सिंह के उस राजनीतिक कौशल को दोहरा पाएंगे? वैसे भी पिछले दो दशक में देश में राजनीतिक धुव्रीकरण की प्रक्रिया ने राजनीति में एक स्पष्ट और निर्णायक विभाजन पैदा किया है। आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक संक्रमण के इस दौर में वैचारिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में अधिक स्पष्टता आई है। जो किसी व्यक्ति विशेष की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए एक मुख्य बाधा है। उस पर देश की राजनीति कांग्रेस द्वारा खडे़ किए आर्थिक एजेंडे की प्रतिक्रिया भर बनी हुई है। इस विपक्षी एकता के पास न कोई साझा कार्यक्रम है और न ही विकल्प की ओर बढ़ने की साझी रणनीति। इसके अतिरिक्त मुख्य विपक्षी खेमे भाजपा और वामपंथ की अपनी परेशानियां भी हैं। भाजपा के पास राज्यों में जानाधार वाले क्षत्रप तो हैं, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर चुंबकीय आकर्षण वाला अटल बिहारी वाजपेयी सरीखा कोई सर्वमान्य नाम नहीं है। नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, डॉ. रमन सिंह, प्रेम कुमार धूमल जैसे नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में अपने लिए एक विशेष स्थान एवं जनाधार तो तैयार किया है, मगर इनमें से कोई भी अपने आप को राष्ट्रीय परिदृश्य और नेतृत्व के अनुरूप न ढाल पाया है, न ही सिद्ध कर पाया है और भाजपा का जो राष्ट्रीय नेतृत्व है, उसकी स्थिति और भी विचित्र है। जहां कई दलों में नेताओं का संकट है, भाजपा नेताओं की अधिकता से त्रस्त है। अब दूसरी, तीसरी पांत और कैडर के लिए समस्या है कि वह किसको अपना एकछत्र नेता स्वीकार करे। दूसरी तरफ वामपंथी दल हैं, जो संभवतया अपने इतिहास की सबसे कठिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। तीन दशक पुराना सबसे मजबूत एवं विश्वसनीय वामपंथी किला पश्चिम बंगाल खिसकता दिखाई पड़ रहा है तो हर पांच साल बाद बदलाव की परंपराओं वाले केरल के बचने का कोई सवाल ही नहीं है। केरल में अबकी बार यूडीएफ की बारी तय है, मगर माकपा के राज्य सचिव पी विजयन और मुख्यमंत्री की सार्वजनिक तकरार शायद अबकी वामपंथी हार को दुगर्ति में बदल देगी। इन गंभीर झटकों के बाद तय है कि वामपंथ को सांगठनिक कठिनाइयों का भी सामना करना पडे़गा। विशेषतौर पर पश्चिम बंगाल, जहां सांगठनिक नेतृत्व का बड़ा हिस्सा सत्ता में पला बढ़ा है, जिसे विपक्ष की न आदत है और न ही उसका स्वाभाविक व्यवहार पता है। अब इस विपक्षी एकता ने कांग्रेसी खेमे में बेचैनी तो बढ़ाई है और इस एकता से यूपीए और कांग्रेस में परेशानी भी है, लेकिन जन विरोधी ही सही, कांग्रेस अब भी अपने निर्णयों पर अटल दिख रही है। असल में स्थितियां अस्सी के दशक के अंतिम वर्षो जैसी नहीं हैं, जहां कांग्रेस अकेली थी। अभी कांग्रेस के पास सहयोगियों का यूपीए सरीखा गठबंधन है, विपक्षी एकता को ध्वस्त करने के ब्रह्मास्त्र भी और यूपीए मंत्रिमंडल में शामिल होने को आतुर लालू, मुलायम और पासवान सरीखी लंबी प्रतीक्षा सूची भी। यदि आज कांग्रेस अगले सत्र में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल लाने का दाव फेंकती है तो इस विपक्षी एकता के सूत्रधार ही सबसे बडे़ एकता भंजक बनकर अभरेंगे। इसके अतिरिक्त राजेंद्र सच्चर कमेटी रिपोर्ट को लागू करना भी दुनिया से लुका-छिपी वाली दक्षिण और वामपंथी अप्रत्यक्ष एकता को हवा करने का कारगर अस्त्र होगा। वास्तव में विरोध और प्रतिक्रिया की इस विपक्षी एकता के पास कोई कार्यक्रम, विकल्प और वीपी सिंह सरीखा बडे़ कद वाला कुशल रणनीतिकार भी नहीं है, जो इस एकता को किसी मंजिल और मुकाम तक पंहुचा सके। इस एकता में संभावनाए तो हैं, लेकिन अंतर्विरोध और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं भी हैं। इसीलिए इस एकता को खतरा किन्हीं बाहरी कोशिश से नहीं, बल्कि यह एकता अंतर्विरोधों एवं महत्वाकांक्षाओं के अपने ही बोझ से ही है। क्योंकि इस एकता का कोई सर्वमान्य एकछत्र नायक नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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