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बुधवार, 3 नवंबर 2010

मनोनयन परंपरा जनवाद की दुर्गति

महेश राठी
राजनीति को नई दिशा देने और सांगठनिक जनवाद की पुर्नस्थपना के तमाम दावों के बावजूद देश के मुख्य राजनीतिक दल कांग्रेस ने एक बार फिर जनवादी परंपराओं को धता बताते हुए 18 राज्य अध्यक्षों का मनोनयन कर डाला। दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र में फिर हार गया लोकतंत्र। कांग्रेस के युवा महासचिव राहुल गांधी ने पार्टी में सांगठनिक जनवाद स्थापित करने के लिए कई विषेशज्ञों की सहायता और सलाह लेने के साथ ही पार्टी और उसके जन संगठनों में चुनाव की प्रक्ति्रया शुरू करने तक की घोषणा कर डाली, लेकिन चुने जाने की इच्छा पर मनोनयन का कौशल भारी पड़ा और अंततोगत्वा जीत कांग्रेस के परंपरागत वंशवादी प्रभुत्ववाद की हुई। विविध अवस्थाओं के लंबे अनुभव वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी की परंपराओं का इतिहास भी उतना ही विविधततापूर्ण रहा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हमेशा से एक परिवार की पार्टी नहीं रही है। एक बेहद गौरवशाली इतिहास के साथ ही आधुनिक भारत के निर्माण में उसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दक्षिण, वाम एवं मध्यम मार्गी सभी मतों एवं विचारधाराओं को समाहित करते हुए कांग्रेस अजादी की लड़ाई का मुख्य मंच बनी। इस प्रकार कांग्रेस का जन्म जनवादी संस्कारों के साथ हुआ, लेकिन गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने और कांग्रेस की कमान संभालने के साथ ही स्थितियों में बदलाव आने लगा। ऐसा नहीं है कि गांधी जनवादी व्यक्ति नहीं थे, गांधी और गांधीवादी विचारधारा सदा जनवादी सहिष्णुता का अच्छा उदाहरण मानी जाती रही है, लेकिन गांधी जी का व्यक्तित्व इतना विराट था कि सभी विचारधाराओं का एक बड़ा मंच भी उनके निर्णयों पर आश्रित हो गया। व्यक्ति विशेष पर आश्रय का यह स्वभाव जनवादी असहमतियों के निषेध का कारण बनकर अंततोगत्वा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में बाधा बनता ही है। आजादी के पहले ही कांग्रेस में 1939 में सुभाष के चुने जाने पर गांधी की हठ में असहमतियों को नकारने का यह गैर जनवादी भाव स्पष्टतया दिखाई देता है। हालांकि गांधीवाद के समर्थक इस सवाल पर गांधी की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के तर्क दे सकते हैं, लेकिन सभी मतों एवं विचारधाराओं के एक मंच पर यह व्यवहार उस मंच का एक विशेष विचारधारा की पार्टी हो जाने की ओर बढ़ने का ही प्रमाण है। जो उस पार्टी में एक खास वर्ग या कहें कि कुछ खास लोगों की पकड़ बनाए रखने की विवशताओं को जन्म देता है। यही वह बिंदु है, जहां से कांग्रेस में जनवादी परंपराओं के ह्रास की शुरुआत होती है। आजादी के बाद सत्ता में आने के बाद पार्टी संगठन पर यह पकड़ बनाए रखने की यह लड़ाई तेज होती चली गई। पं. जवाहर लाल नेहरू तक तो फिर भी गनीमत थी और उन्होंने काफी हद तक जनवादी परंपराओं का निर्वाह करने की कोशिश की। प्रथम प्रधानमंत्री स्वयं जाने माने वामपंथी रूझान वाले नेता थे, फिर भी उनके मंत्रिमंडल में गोविंद वल्लभ पंत और श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरीखे दक्षिणपंथी नेताओं को भी यथायोग्य स्थान प्राप्त था। असली समस्या लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी के परिदृश्य पर उभर कर आने के बाद शुरूहुई। इंदिरा गांधी को ही देश में जोड़-तोड़ की ऑपरेटर राजनीति की शुरुआत का श्रेय जाता है। सत्ता प्राप्ति के लिए इंदिरा गांधी ने कामराज के नेतृत्व वाले कांग्रेस के भीतरी गुट सिंडीकेट का सहारा लिया और कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर जब कामराज से चुनौती महसूस हुई तो कामराज को भी किनारे कर दिया। दरअसल, कांग्रेस में इंदिरा गांधी का पदार्पण जनवाद के खात्मे की औपचारिक उद्घोषणा और एक परिवार के प्रभुत्व के नए युग की शुरुआत था। पार्टी पर अपने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए इंदिरा गांधी ने पार्टी में कई विभाजनों की पटकथा लिखी। इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए दक्षिणपंथी रूझानों से लेकर वामपंथी नारों तक सभी हथकंडों का इस्तेमाल किया। इंदिरा गांधी के बाद उनकी अगली पीढि़यों ने भी पार्टी पर प्रभुत्ववादी आधिपत्य बनाए रखने की उनकी परंपरा को यथासंभव आगे बढ़ाया। अनुभवहीन राजीव गांधी ने भी पार्टी पर परिवार के प्रभुत्व को बनाए रखने में पूरी कुशलता का परिचय दिया। उनके कार्यकाल में भी पार्टी ने एक विभाजन झेला। वास्तव में इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में अपने अनुभवों से यह समझ लिया था कि सत्ता की कुंजी पार्टी संगठन के शीर्ष पद पर परिवार से इतर किसी बाहर के व्यक्ति को बैठाना ही अपने लिए चुनौती पैदा करना है। इसीलिए 1978 के बाद गांधी परिवार के राजनीति में सक्ति्रय रहते कांग्रेस अध्यक्ष पद पर किसी बाहरी नेता को बैठने का कभी मौका नही मिला। राजीव गांधी की हत्या के बाद जब सोनिया गांधी राजनीति में आने या न आने को लेकर संशय में थीं, तभी नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ। हालांकि दोनो सौभाग्यशाली व्यक्तियों के बारे में गांधी परिवार की राय देश का हर आदमी जानता है। ये दोनों नाम कांग्रेस के लिए केवल अवांछित ही नहीं, अक्षम्य दोषियों की तरह जाने जाते हैं। यह भावना उस संस्कृति का प्रतिफल है, जिसको इंदिरा गांधी के अथक प्रयासों ने स्थापित किया और उनकी अगली पीढि़यों ने बड़ी कोशिशों के साथ आगे बढ़ाया। यही वास्तविक कांग्रेसी जनवाद है, जिसमें चुने जाने की इच्छा के लिए कोई स्थान नहीं। यदि गांधी परिवार से बाहर के लोगों से कोई अपेक्षा है तो वह है उनमें मनोनीत हो सकने का कौशल, जो केवल चाटुकारिता से ही आता है। अब यदि कांग्रेसी राजनीति के सबसे सुरक्षित युवा नेता को संगठन में आंतरिक जनवाद की चिंता है तो उसके भी शुद्ध राजनीतिक कारण ही हैं। राहुल गांधी ने कांग्रेस के छात्र एवं युवा संगठनों में साफ सुथरे चुनाव करवाने और किसी भी छात्र नौजवान को चुने जाने का मौका देने की मुहिम की शुरुआत दिखाने की कोशिश की और जब देश की आधी से अधिक आबादी युवा हो तो यह आवश्यकता समझी जा सकती है। आजकल यह युवा राग भारतीय चुनावी राजनीति की नई जरूरत है। अपने इस अभियान की प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए एक गैर सरकारी संगठन की स्थापना भी की गई, जिसका काम साफ सुथरे चुनाव करवाना था और इस संगठन के कर्ताधर्ता के तौर पर देश के दो सबसे योग्य चुनाव आयुक्तों जेएम लिंगदोह और केजे राव को नियुक्त किया गया, लेकिन जब चुने जाने के इस अधिकार का सफर कांग्रेस पार्टी के संगठन में पंहुचा तो जनवाद ने दम तोड़ दिया। भारतीय राजनीतिक दलों के आंतरिक जनवाद का यह कुरूप चेहरा ऐसा नहीं है कि केवल कांग्रेस का ही है, बल्कि देश के लगभग सभी दल इस लोकतांत्रिक विकृति का शिकार हैं। पार्टी विद द डिफरंस का दावा करने वाली दक्षिणपंथी भाजपा से लेकर वर्गहीन समाज स्थापना की राजनीति करने वाले वामपंथी तक कोई इस रोग से अछूता नहीं है। छोटी क्षेत्रीय पारिवारिक पार्टियों की तो बात ही क्या। वास्तव में राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनवाद की यह दुगर्ति कहीं न कहीं जनवाद के विकास से भी जुड़ी है। केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में लोकतंत्र में एक शिथिलता व्याप्त है, क्योंकि दुनिया में जिस रूप में आर्थिक एवं तकनीकी विकास हुआ है, लोकतंत्र का विकास उसके अनुरूप नहीं हो पाया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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